जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ता गया है, व्यक्तित्व के भी नए-नए मानदंड विकसित हुए हैं या कहें कि सांचे तैयार हो गए हैं। हर आदमी इस कोशिश में रहता है कि वह किसी सांचे में फिट हो जाए। इसके लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। लेकिन दूसरी तरफ उनके मन में तरह-तरह के स्वप्न आकार लेते रहते हैं, भाव उमड़ते रहते हैं। विचित्र-विचित्र आकांक्षाएं पैदा होती रहती हैं। लेकिन इस बारे में कोई कम ही बात करता है क्योंकि ये बातें किसी सांचे के अनुकूल नहीं होतीं बल्कि प्रतिकूल ही होती हैं। इसलिए आजकल मन की बातें बताने का चलन खत्म हो गया है।
लोग उन्हें अपने भीतर ही सीमित रखना चाहते हैं। उन्हें छिपाते हैं। हम जो भी बातें करते हैं, उनमें इस बात का खासतौर से ध्यान रखते हैं कि अपने भीतर की वे सहज, अनगढ़ इच्छाएं कहीं झलक न जाएं। यानी हम छिपाते ज्यादा हैं। जो हमारा सहज और स्वाभाविक है, उसे छिपा लेना एक कला का रूप लेता जा रहा है।
संजय कुंदन
Thursday, 23 July 2009
छिपाने की कला
छूट की हद
कोई छूट पाना या उसे पाने की कोशिश करना हम में से बहुतों का सपना होता है। देर से पहुंचने की छूट, कीमत में छूट, योग्यता में छूट- ऐसी तमाम छूटें पाकर हमें लगता है कि हमने अपना जीवन दूसरों की तुलना में थोड़ा आसान बना लिया है।
पर अक्सर यह बात भ्रम ही साबित होती है कि छूट ने हमें कोई सहूलियत दी है। छूट के सिद्धांत को व्यापार के गणित के नजरिए से देखें, तो इसके निहितार्थ का खुलासा हो जाता है। अगर कोई वस्तु हमें छूट पर दी जा रही है, तो साफ है कि या तो वह वस्तु चलन से बाहर हो गई है या फिर प्रतिस्पर्द्धा में उसका बाजार मूल्य उतना नहीं रह गया है जितना हमें दिखाई देता है। यानी किसी तरह उसे ग्राहक तक पहुंचा देने की मजबूरी उसकी कीमत में छूट दिला रही है। जब ये मजबूरियां नहीं रहतीं, तो वही वस्तु सामान्य के मुकाबले कई गुना अधिक कीमत पर मिलती है। निष्कर्ष यह है कि आज हम अगर व्यवहार में या अपनी योग्यता में कोई छूट पा रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि श्रेष्ठ विकल्प के अभाव में हमें ढोया जा रहा है। जिस वक्त वह श्रेष्ठ विकल्प मिल जाता है, छूट पा रहे लोगों को हाशिये पर धकियाए जाने में समय नहीं लगता।
संजय कुंदन
