जब किसी महत्वपूर्ण या स्थापित व्यक्ति को हम सहज होकर मिलते या साधारण बातें करते देखते हैं तो हमें अच्छा लगता है और हम उसकी प्रशंसा करते हैं। तब हमें वह ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगता है और हम कह बैठते हैं -वह सचमुच महान है। यानी वह असाधारण व्यक्ति हमें ज्यादा प्रभावित करता है, जो साधारण नजर आता है।
जैसे बच्चों के साथ खूब घुल-मिलकर बात करने वाले राजनेता की एक अलग पहचान बन जाती है। मृदुभाषी होना किसी राजनेता का विशिष्ट गुण हो जाता है। कोई फिल्म स्टार अगर सामान्य कपड़े पहनता है और अपने संघर्षमय अतीत को हमेशा याद रखता है, तो आम आदमी उससे ज्यादा निकटता महसूस करता है। यानी साधारणता ही व्यक्ति की मूल कसौटी है। किसी का साधारण होना यह दर्शाता है कि वह कितना मानवीय है और लोग अपने नायकों को मानवीय देखना चाहते हैं। कोई कितना भी प्रतिभावान क्यों न हो, अगर वह मानवीय नहीं है तो उसे व्यापक स्वीकृति नहीं मिल पाती। शायद यही वजह है कि हम महान व्यक्तियों के विचार से ज्यादा उसके जीवन प्रसंगों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। असल में हम उनमें साधारणता की खोज कर रहे होते हैं।
संजय कुंदन
Thursday, 28 May 2009
साधारणता की खोज
Thursday, 21 May 2009
आकलन से ज्यादा
ऊपरी तौर पर समस्त प्रकृति में हर चल-अचल चीज की एक निश्चित भूमिका और एक निश्चित काम दिखाई देता है। इस आधार पर मान लिया जाता है कि बादलों का काम सिर्फ वर्षा करना या पेड़ों का सिर्फ छाया देना है। पर भूमिकाओं का निर्धारण करने वाला ऐसा आकलन अक्सर अधूरा होता है। पेड़ जिस जगह खड़ा है, वहां वह सिर्फ छाया नहीं करता, वहां की जमीन को उपजाऊ भी बनाता है, वहां की आबोहवा में अपने फूल-पत्तों से सुगंध और नरमाई भी घोलता है।
इसी तरह शरीर के अलग-अलग अंगों को ही लें। कान सिर्फ सुनता ही नहीं, क्या सुनना है क्या छोड़ना है- इस तरह का संपादन भी करता है। हाथ सिर्फ वजन नहीं उठाते, लेखन और कई कलात्मक कार्य करने के अलावा स्पर्श के माध्यम से दूसरे के अस्तित्व का अहसास भी हमें कराते हैं।
किसी चीज के बारे में अगर यह मान लिया गया है कि जितनी और जैसी भूमिका उसकी तय की गई है, वह उसी दायरे में रहेगा, तो यह हमारी भूल है। अक्सर ऐसे आकलन बड़ा झूठ साबित होते हैं और यह नतीजा हमारे सामने आता है कि जिसकी जो हैसियत, खूबी या कमी बताई जाती रही है, वह असल में उससे अलग है और निर्धारित की गई क्षमता से ज्यादा ताकत उसमें है।
संजय वर्मा
धारणाओं के पार
लोगों के बारे में कामचलाऊ राय बनाने के लिए अक्सर हम धारणाओं का सहारा लेते हैं। जज यानी न्याय में आस्था रखने वाला ईमानदार आदमी, फौजी यानी देश के लिए मर-मिटने वाला शेरदिल इंसान, कलाकार यानी कल्पना में खोया रहने वाला, वैज्ञानिक यानी चीजों की बारीकियां तलाशने वाला गैर-दुनियादार इंसान...वगैरह। ये धारणाएं हम कुछ पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर बनाते हैं और अक्सर इनके आधार पर ही लोगों से व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। अतीत में ऐसी धारणाएं जातियों के आधार पर बनाई जाती थीं।
जैसे ब्राह्मण यानी विद्वान, क्षत्रिय यानी पराक्रमी...आदि। जब भी ये धारणाएं टूटती थीं तब मूर्ख ब्राह्मण कथा जैसी कहानियां बन जाया करती थीं। इनसे पिछला स्टीरियोटाइप टूटता नहीं था, सिर्फ एक और स्टीरियोटाइप उसके साथ नत्थी हो जाता था। आज वैसा नहीं है। एक घूसखोर जज का मामला सामने आते ही लोग पूरी न्यायपालिका को शक की नजर से देखने लगते हैं और एक वैज्ञानिक को चंद्रग्रहण के वक्त नहाते देख सारे वैज्ञानिकों को पोंगा समझ लिया जाता है। लोगों को धारणाओं से बाहर इंसान की तरह देखना हम कब सीखेंगे?
चंद्रभूषण
अवगुण का दुर्गुण
सत्य को सबसे बड़े मानवीय गुणों में गिना जाता है। पर सच को कटु या कड़वा भी कहा जाता है। अक्सर कहा जाता है कि सच्ची बात तो चुभेगी ही। आखिर सच का यह कैसा गुण है कि वह दिल पर बरछी सा प्रहार करे? क्या शायद इसीलिए कहीं-कहीं यह ताकीद की गई है कि ऐसा सच बोलिए, जो प्रिय हो? संभवत: अच्छे गुणों के साथ इन उपमाओं को जोड़ने का उद्देश्य सद्गुणों की महत्ता स्थापित करना होगा। असल में सद्गुणों का एक दुर्गुण यह है कि वह अपने साथ कोई न कोई अहंकार लाता है। सच के साथ कटुता का मेल इसी का नमूना है। सौंदर्य यानी रूप में भी दंभ रूपी अहंकार झलकता है। सुभाषित कहने वालों ने इस महीन गठजोड़ को पकड़ा है। इसीलिए उन्होंने सच की प्रियता की जरूरत की ओर इशारा किया है। सौंदर्य के साथ विनयशीलता जरूरी मानी है। चूंकि सच को मृदुता के साथ कहने वालों की बेहद कमी है और सच बोलने वाले ज्यादातर लोग अहं के शिकार हो जाते रहे हैं, इसलिए सच के साथ कटुता का मेल स्थापित हो गया और कड़वे सच की बात चलन में आ गई।
संजय वर्मा
Monday, 11 May 2009
प्रतियोगिता से मुक्ति नहीं
अक्सर यह बात कही जाती है कि आदमी होड़ में न पड़े। होड़ मनुष्य को गहरे तनाव में डाल देता है, असहज बना देता है। लेकिन क्या मनुष्य किसी भी होड़ से अपने को अलग कर पाता है?
मनुष्य अगर अपने को होड़ से अलग भी कर ले तो वह चैन से नहीं बैठ पाता। हो सकता है तब उसे अपना जीवन शिथिल और निरुद्देश्य लगने लगे। ऐसे लोग कम होते हैं जो अपनी हर तरह की इच्छा से निरपेक्ष होकर परम संतुष्ट जीवन जी सकें। हम ज्यों ही कोई कामना करते हैं, किसी न किसी प्रतियोगिता में उतर जाते हैं। अगर कोई खुद के लिए कुछ नहीं चाहता तो अपनी संतान के लिए इच्छा करता है। संतान को बेहतर जीवन देने की चाह में वह दूसरे की संतानों से उनकी तुलना करने लगता है और उन्हें अच्छे से अच्छा बनाने की होड़ में फिर उतर आता है। जीवन है, तो प्रतियोगिता है। इनसे घबराने से अच्छा है इन्हें स्वीकार किया जाए लेकिन अपनी इस वृत्ति पर नियंत्रण भी रखा जाए।
संजय कुंदन
हमारी अज्ञानता
हमें लगता है कि हम जिन चीजों के करीब रहते हैं, उनके बारे में सब कुछ जानते हैं। सचाई इसके विपरीत है। अकसर हम उन्हीं चीजों को नहीं जानते जिनसे हमारा रोज सामना होता है, जिन्हें हम रोज देखते हैं। जैसे यह संभव है कि कोई व्यक्ति उस सड़क के किनारे या आसपास की चीजों को कभी न देखे, जिससे होकर वह रोज दफ्तर जाया करता है।
हालांकि उन चीजों पर हमेशा उसकी नजर होती है लेकिन वह दिमाग से कहीं और होता है। वह समय पर दफ्तर पहुंचने के तनाव में होता है। वह यह सोच रहा होता है कि उसे कौन से काम निपटाने हैं, क्या-क्या करना है। इसी तरह शाम में घर लौटते हुए भी वह घर पहुंचने की जल्दी में होता है या किन्हीं और जरूरी चीजों में उलझा होता है। इस दौरान वह एक पेड़ को देखकर भी दरअसल उसे नहीं देख रहा होता है। रोज-रोज उसकी नजर अपने दफ्तर के ठीक बगल वाली दुकान पर पड़ती है लेकिन अगर उससे पूछा जाए कि उसके ऑफिस के ठीक बगल में क्या है, तो मुमकिन है वह न बता सके।
संजय कुंदन
भविष्य का भय
हम भविष्य के लिए अपनी तैयारियों को देखें तो पता चलेगा कि इसमें भय की बड़ी भूमिका है। हम पैसे बचाते हैं यह सोचकर कि कहीं अचानक कोई संकट आ गया तो! हम किसी मुश्किल में न पड़ें इसके लिए साधन जुटाते हैं। आम तौर पर हम यह नहीं सोचते कि संचित किए गए धन या साधन का कोई सार्थक इस्तेमाल करेंगे या अपने मन में दबी किसी योजना को मूर्त रूप देने के लिए इसका प्रयोग करेंगे या इससे और ज्यादा सुख हासिल करेंगे।
प्राय: लोग यह कहते हैं कि वे अपने बच्चों के लिए अर्जित कर रहे हैं। इसके पीछे भी वही भय है। उन्हें यह आशंका सताती रहती है कि अगर बच्चे अपने लिए कुछ हासिल न कर सके, तो क्या होगा। जाहिर है हमारी नकारात्मक सोच ही हमसे संचय करवाती है। अगर हमें भविष्य का भय न हो और अगर हम यह मानकर चलें कि कल सब कुछ बेहतर होने वाला है तो शायद हम संचय पर ध्यान ही न दें। हो सकता है इंसान की भागदौड़ तब कम हो जाए।
संजय कुंदन
