Wednesday, 25 February 2009

अच्छाई का प्रचार

समाज में अच्छाई  का प्रचार निरंतर चलता रहता है। इसके लिए शिक्षा सबसे बड़ा माध्यम है। मनुष्य को शिक्षित करना दरअसल उसे बेहतर मनुष्य बना ने का प्रयत्न है। नियमित शिक्षण कार्य के अलावा कुछ लोग धार्मिक उपदेशों के जरिए समाज को अच्छाई का संदेश देते रहते हैं। फिर भी समाज से बुराई खत्म होने का नाम नहीं ले रही, जबकि बुराई का तो कोई प्रचार भी नहीं करता। कभी किसी अपराधी ने आज तक जुर्म के पक्ष में भाषण नहीं दिया।

हत्यारों ने बाकायदा संस्था बनाकर हत्या करने के तरीके नहीं सिखाए, बल्कि इसके विपरीत वे लोगों को अपराध से अलग रहने की सलाह देते हैं। इसका अर्थ यह है कि असभ्यता को सीखना नहीं पड़ता, वह तो स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर होती है। लेकिन हम प्रयत्न करके सभ्य बनते हैं, यानी अच्छाई हमें सीखनी पड़ती है।

हम शिक्षा और संस्कृति के हथियारों से अपनी स्वाभाविक वृत्ति को परास्त करने का प्रयत्न करते हैं। इसलिए अगर बुराई आज भी दिख रही है तो इसका मतलब यह है कि अच्छाई के प्रचार का काम कहीं न कहीं कमजोर पड़ रहा है।

जिंदगी और सामान

पहले मनुष्य का  जीवन बेहद सीमित था। उसके खान-पान के व्यंजन सीमित थे। अपने क्षेत्र में उपलब्ध सामग्री से वह अपना भोजन तैयार करता था। उस के मनोरंजन के साधन सीमित थे -खेल-कूद, गीत, नृत्य, बतरस, युद्ध कौशल और कलाओं का प्रदर्शन आदि। उसके काम की प्रकृति भी युद्ध, व्यापार, शिक्षा और कृषि तक सीमित थी।

धीरे-धीरे सभ्यता का विस्तार हुआ। लोग चांद तक जाने लगे। हवाओं में उड़ने का आनंद लेने लगे। टीवी और कंप्यूटर भी काम और मनोरंजन में शामिल हो गया। देश-विदेश के परिधान, गहने और व्यंजन उपलब्ध होने लगे। आसपास लिफ्ट, कार, प्लेन, पिजा, मसाज, कैसिनो, बार, डियो, आई-पॉड जैसी चीजों की तादाद जितनी बढ़ी, उनको भोगने की आदमी की आजादी उतनी घटती गई। पहले आदमी के पास जो कुछ भी था, उसे वह जी भर कर जी सकता था।

जीवन के हर पक्ष का जी भर कर सुख ले सकता था। अब उसके जीवन में अनगिनत चीजें आ गई हैं, पर उसके भोग का दायरा संकुचित हो गया है। आसपास चीजें बहुत सारी हैं, पर वह चंद चीजों के सहारे ही जीवन बिता रहा होता है। चीजों को भोगने की लालसा में जीवन को जीने का सुख उसके हाथ से फिसल गया है।

बामुसि

सामूहिकता के विरुद्ध

ऐसे कई लोग  हैं जो यह मानते हैं कि सामूहिकता की कमी ने समाज के सामने संकट पैदा कर दिया है। चूंकि, व्यक्ति अकेला हो गया है, इसलिए वह मूल्यों से कट गया है और कई बार गलत कदम उठा ले रहा है। यह भी कहा जाता है कि आजकल बच्चों में सामूहिकता की भावना लुप्त होती जा रही है, इसलिए वे स्वार्थी होते जा रहे हैं। ये सारी बातें अपनी जगह सही हैं, लेकिन सामूहिकता के दूसरे पहलुओं पर विचार करना भी जरूरी है।

समाज में व्यक्तिवाद यूं ही नहीं आ गया है। दुनिया में इसके पक्ष में बड़े-बड़े आंदोलन हुए और उसे प्रतिष्ठा मिली। सामूहिकता कई बार मनुष्य को वैचारिक रूप से परतंत्र बना देती है। आदमी समूह का दास बन जाता है और समूह के मूल्यों को ही अंतिम मान लेता है। वह मौलिक चिंतन करने की जरूरत ही नहीं महसूस करता। लेकिन जिन लोगों ने समूह के दबाव को नकारकर अपना रास्ता खुद ढूंढा, वे समाज के लिए ज्यादा उपयोगी साबित हुए। कई समूहों ने ही जातिवाद या इस जैसी दूसरी कुप्रथाओं को पाल-पोसकर रखा, लेकिन इन कुरीतियों को चुनौती देने की शुरुआत समूह से टकराकर ही हुई।

Tuesday, 24 February 2009

अनिश्चितता के बीच

योजना बनाना मनुष्य के स्वभाव का अंग है। हर व्यक्ति अपने जीवन के बारे में तरह-तरह की योजनाएं बनाता है। प्राय: हर सचेत व्यक्ति अपने रोजमर्रा जीवन की आवश्यकताओं पर होने वाले खर्च का हिसाब-किताब रखता है।

यह व्यक्ति द्वारा खुद को एक निश्चित व्यवस्था में रखने और अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने की एक कोशिश है। हालांकि हमारे तमाम प्रयत्नों के बावजूद हमारी योजनाएं शत-प्रतिशत सफल नहीं हो पातीं। अक्सर हम अपनी इच्छाओं से परास्त होते हैं या कुछ ऐसी अप्रत्याशित स्थितियां आ जाती हैं कि हमारा हिसाब-किताब गड़बड़ा जाता है लेकिन इसे मनुष्य की असफलता मानना ठीक नहीं होगा।

हमारी किसी योजना का लड़खड़ाना इस बात का सबूत है कि हम मनुष्य हैं, मशीन नहीं और जीवन में सब कुछ तयशुदा तरीके से घटित नहीं होता। जीवन की अनिश्चितता ही शायद उसे रोचक बनाती है। इसी अनिश्चितता और हमारी योजनाओं में एक रस्साकशी चलती रहती है। इसमें हमारी जीत महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है अनिश्चितता में भी एक व्यवस्था बनाने का प्रयत्न। बजट चाहे व्यक्ति का हो या राष्ट्र का, वह इन्हीं प्रयत्नों की एक कड़ी है।

संजय कुंदन

निजी बनाम सार्वजनिक जीवन

हम कुछ चीजों को अपना व्यक्तिगत मामला बताते हैं लेकिन सच कहा जाए तो हमारे कई निजी प्रसंगों का गहरा सामाजिक संदर्भ होता है। हमारा कोई भी मनोभाव समाज से या सार्वजनिक जीवन से निरपेक्ष नहीं है। 

अगर कोई समाज को नकारना चाहता है, तो उसके भीतर उपजे नकार के भाव के लिए भी सामाजिक परिस्थितियां ही किसी न किसी रूप में जिम्मेदार होती हैं। ऐसे लोग बहुत हैं, जिनका निजी कष्ट एक व्यापक सार्वजनिक पीड़ा के रूप में व्यक्त होता है। जैसे कोई व्यक्ति प्रेम में असफल होने के बाद अचानक देश और समाज के लिए चिंता व्यक्त करने लगता है। संभव है प्रेम हासिल होने के बाद उसकी यह चिंता समाप्त हो जाए। लेकिन इसका उलटा भी संभव है। ऐसे भी लोग हैं जो अपनी निजी चिंताओं से ऊपर उठ जाते हैं। वे दूसरों के दुखों को अपना समझते हैं और उन्हें दूर करने के लिए उसी तरह तत्पर हो जाते हैं जिस तरह वे अपने कष्टों से लड़ते हैं। ऐसे लोग कम होते हैं, लेकिन इन्हीं के बीच से समाजसुधारक या राष्ट्रसेवी पैदा होते हैं।

संजय कुंदन

दुख का महत्व

कोई नहीं चाहता कि उसके जीवन में दुख-तकलीफ आए। हम दुख को नकारते जरूर हैं पर उसे अपने जीवन से बाहर नहीं कर
ते। प्राय: उसे संजो कर रखते हैं। जब हमारे सामने कोई अपने किसी कष्ट की चर्चा शुरू करता है तो हम भी अपने किसी पुराने दुख पर बात करने लगते हैं।

अगर हम दुख पर चर्चा करते दो लोगों को देखें तो लगेगा कि दोनों में अपने कष्ट को बड़ा बताने की होड़ सी लगी हुई है। हर व्यक्ति अपने कष्ट को सबसे बड़ा मानता है क्योंकि उसकी अनुभूति से वह सीधा जुड़ा होता है। अगर मनुष्य को अपने दुखों से प्यार नहीं होता तो साहित्य में ट्रैजिडी की अवधारणा ही सामने नहीं आती, केवल सुखांत साहित्य रचा जाता।

असल में दुख एक कसौटी है। दुख की चर्चा के पीछे यह भाव रहता है कि देखो मैं इतनी तकलीफों को पार कर यहां तक पहुंचा हूं, मैं इतने कष्टों के बीच भी अविचल रहा हूं। दुख के माध्यम से हम स्वयं को प्रमाणित करते हैं। दुख एक ध्वज है जिसे लहराकर हम अपनी सफलता की घोषणा करते हैं।

संजय कुंदन 

देखना - अनदेखना

जब कोई व्यक्ति हमारे  पास से चला जाता है, तब अचानक हमें उसके बहुत सारे गुण याद आने लगते हैं। जब किसी का निधन हो जाता है, तब हम उसके सद्गुणों को याद करते हैं। जब कोई वस्तु छिन जाती है, तो हम सोचते हैं कि उसकी वजह से हमें क्या -क्या सुविधाएँ प्राप्त होती थीं। अजीब बात है कि जब वह चीज हमारे पास होती है, जब तक वह व्यक्ति हमारे साथ होता है, हम उसके गुणों को इतने निश्छल मन से नहीं स्वीकार करते।

शायद हमारे भीतर एक अज्ञात भय बसा होता है कि उसके गुणों का बखान करने से हमारी महानता बौनी हो जाएगी। शायद यह आशंका रहती है कि वह गुणी व्यक्ति अचानक कोई ऐसा काम कर देगा जिससे हमारा अहित हो जाएगा। जिस दिन ऐसी आशंकाओं से मुक्त हो कर हम अपने साथ चलने वालों के गुणों को सराहना सीख जाएँगे, उसी दिन हमारी यह दुनिया बदल जाएगी। गुण- अवगुण तो सब में हैं, उसे देखना -अनदेखना हम अपने स्वार्थ के अनुसार करते हैं।

बामुसि

मैं हूं अपना नायक

अनुकरण हमारे स्वभाव  का हिस्सा है। मनुष्य हमेशा दूसरों से कुछ न कुछ सीखने की चेष्टा करता है। कई बार वह दूसरों से अच्छी चीजें ग्रहण करता है तो कई बार बुरी चीजें भी। एक व्यक्ति कोई भी नया काम शुरू करने से पहले एक मानक तय करता है।

यह मानक वह प्राय: अपने आसपास के ही किसी इंसान को बनाता है और ठीक उसी के जैसा प्रयत्न शुरू कर देता है। लेकिन कई बार वह गलत नायक चुन लेता है और अपनी स्वाभाविक वृत्ति से भटक जाता है। संभव है कि हमारे किसी नायक से बेहतर मानक हमारा स्वयं अपना ही जीवन हो। इसलिए हमेशा बाहर देखने की आदत को छोड़कर अपने भीतर भी देखना चाहिए।

संघर्ष का अपना ही कोई पुराना अध्याय हमें कि सी नए मोड़ पर कहीं ज्यादा संबल प्रदान कर सकता है। तो क्यों न हम अपने आप को ही अपना नायक मानें और अपने एक प्राप्त लक्ष्य को प्रस्थान बिंदु बनाकर नए लक्ष्य का संधान करें। दूसरों से सीखना हमेशा महत्वपूर्ण है पर खुद को दूसरों की जगह पर रखकर सीखना भी एक रोचक अनुभव हो सकता है।

संजय कुंदन  

बड़ा अभियान


अतीत में ऐसी कई  मिसालें मिलती हैं कि कैसे बड़े अभियानों से देश और समाज में व्यापक परिवर्तन आए। कुरीतियों का खात्मा हुआ और कई सामाजिक
सुधार हुए। इस आधार पर कहा जाता है कि बड़े अभियान चलाए बिना कुछ हासिल नहीं होता।

आज के नौजवान भी अक्सर यह दुहाई देते हैं कि जिंदगी में कुछ बड़ा किया जाए, तो ही जीवन की सार्थकता है। बड़ी पूंजी लगाई जाए, बड़े कारखाने खोले जाएं। पर क्या बड़े अभियान और बड़ी योजना के बिना जिंदगी में वास्तव में कुछ भी कायदे का नहीं हो सकता? अक्सर होता यह है कि बड़ी योजनाओं का सपना देखते-देखते पूरी उम्र बीत जाती है। जिस तरह कोई बड़ी इमारत छोटी-छोटी ईंटों को लगाए बिना नहीं बन सकती, कोई लंबी रस्सी छोटे-छोटे रेशों को एक साथ बंटने से नहीं पूरी हो सकती, उसी तरह कोई बड़ी योजना छोटे-छोटे प्रयासों के बिना मुकम्मल नहीं हो सकती। छोटी जलधाराएं नहीं होतीं, तो बड़ी नदी भला किस तरह बनती? छोटी-बड़ी हर तरह की नदियां नहीं होतीं, तो क्या महासागरों को भरा जा सकता था? बड़े अभियानों का आरंभ एक छोटी कोशिश है, उसकी सार्थकता यही है कि उसके बिना कोई योजना बड़ी बन ही नहीं सकती।

संजय वर्मा  

जिंदगी है ट्रेन

जिंदगी एक ट्रेन की तरह  है। इसकी शुरुआत एक स्टेशन से होती है और आखिरी स्टेशन तक पहुंचने से पहले उसे छोटे-बड़े स्टेशनों की तरह कई तरह के
पड़ावों से गुजरना पड़ता है, रास्ते में कई पटरियां बदलनी होती हैं।

हालांकि हरेक की कामना होती है कि राजधानी या शताब्दी की तरह पहले और आखिरी स्टेशन के बीच जिंदगी की उसकी गाड़ी सुख के फर्राटे भरती रहे, छोटे या बड़े कैसे भी दुख के स्टेशनों पर हरगिज न रुके, पर जाहिर है, ऐसा होता नहीं है। आपकी ट्रेन भले ही एक्सप्रेस गाड़ी हो, गंतव्य से पहले उसके रुकने का कायदा न हो, तो भी अक्सर बीच में कहीं न कहीं उसे रुकना ही पड़ जाता है। कोई न कोई बाधा उसके रास्ते में आ ही जाती है। अफसोस न करें, अगर वह कोई बेहद छोटा सा, निराश करने वाला, बुझा-बुझा सा दिखने वाला स्टेशन हो। सवाल है कि क्या छोटे स्टेशनों को बिना पार किए बड़े या आखिरी स्टेशन तक पहुंचा जा सकता था? अगर यह तय है कि हमारे रास्ते में कई छोटे स्टेशन हैं, तो उन पर ठहरकर उनका भी मजा क्यों न लिया जाए। क्या पता वे छोटे स्टेशन बड़े स्टेशनों के मुकाबले कुछ ज्यादा रोशनी दिखा जाएं।

संजय वर्मा  

जो अपरिभाषित है

यह जरूरी नहीं कि जीवन की हर वस्तु या प्रसंग के दो पहलू हों -रात और दिन की तरह। जीवन का इतना सरल विभाजन कई स्तरों पर तो है, लेकिन हर जगह
इसे ढूंढना गलत होगा। हमने अपनी सुविधा के लिए दो पहलू जरूर बना लिए हैं, पर चीजें उन्हीं में सिमटी नहीं। ऐसा नहीं है कि जीवन में या तो सुख है या फिर दुख, सच है या फिर झूठ।

असल में सुख और दुख के बीच की भी एक अवस्था है। इसी तरह सच और झूठ के बीच भी कोई स्थिति है। इनके बीच एक रेखा है जो स्थान, समय और व्यक्ति की समझ और सोच के मुताबिक धुंधली तथा गहरी होती रहती है। इसी तरह निर्णय और अनिर्णय के बीच की भी एक दशा होती है, जिसमें अधिकतर लोग फंसे रहते हैं। 'बिटविन द लाइंस' की अवधारणा इसी के कारण पैदा हुई है। यानी अर्थ और अनर्थ के बीच तथा कहे और अनकहे के बीच अभी बहुत कुछ है, जिनका सामने आना बाकी है। संभव है, प्रकट और अप्रकट के बीच की किसी अवधारणा में हमें भावी जीवन के कई अहम सूत्र मिल जाएं। हो सकता है अब तक जो अपरिभाषित है, उसी में हमें अपने समय की कोई परिभाषा मिल जाए।

संजय कुंदन