कोई छूट पाना या उसे पाने की कोशिश करना हम में से बहुतों का सपना होता है। देर से पहुंचने की छूट, कीमत में छूट, योग्यता में छूट- ऐसी तमाम छूटें पाकर हमें लगता है कि हमने अपना जीवन दूसरों की तुलना में थोड़ा आसान बना लिया है।
पर अक्सर यह बात भ्रम ही साबित होती है कि छूट ने हमें कोई सहूलियत दी है। छूट के सिद्धांत को व्यापार के गणित के नजरिए से देखें, तो इसके निहितार्थ का खुलासा हो जाता है। अगर कोई वस्तु हमें छूट पर दी जा रही है, तो साफ है कि या तो वह वस्तु चलन से बाहर हो गई है या फिर प्रतिस्पर्द्धा में उसका बाजार मूल्य उतना नहीं रह गया है जितना हमें दिखाई देता है। यानी किसी तरह उसे ग्राहक तक पहुंचा देने की मजबूरी उसकी कीमत में छूट दिला रही है। जब ये मजबूरियां नहीं रहतीं, तो वही वस्तु सामान्य के मुकाबले कई गुना अधिक कीमत पर मिलती है। निष्कर्ष यह है कि आज हम अगर व्यवहार में या अपनी योग्यता में कोई छूट पा रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि श्रेष्ठ विकल्प के अभाव में हमें ढोया जा रहा है। जिस वक्त वह श्रेष्ठ विकल्प मिल जाता है, छूट पा रहे लोगों को हाशिये पर धकियाए जाने में समय नहीं लगता।
संजय कुंदन
Thursday, 23 July 2009
छूट की हद
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