Wednesday, 26 August 2009

अबूझ गति

जिस समय हम सोचते हैं कि सफलता की ऊंचाइयां हासिल करने जा रहे हैं, उसी वक्त कोई गहरी खाई तैयार हो रही हो ती है, जिसमें हम गिरने वाले हैं। जिस समय हम खुद को असहाय और डूबता हुआ समझ लेते हैं, उसी वक्त कोई तेज हहराती हुई लहर उठ रही होती है, जो हमें उछाल कर किनारे फेंक देने वाली है। मेंढक किसी पतंगे का निशाना साधते समय यह नहीं जानता कि उसके पीछे घात लगाए सांप सरक रहा है। और सांप नहीं जानता कि अचानक किस झाड़ी से निकल कर नेवला उसे दबोचने वाला है।

यह काल की अबूझ गति नहीं है। यह भाग्यवाद नहीं है। यह हमारी आंखों की, हमारी सूझ-बूझ और सतर्कता की सीमा है, जिसके आगे हम नहीं देख पाते। हम अपनी सफलता या असफलता के उस एक क्षण को अंतिम सत्य मान लेते हैं, जो कि सच नहीं होता। इसलिए उससे अलग कोई भी स्थिति हमें विस्मय से भर देती है।

Monday, 3 August 2009

विरोधी की तरह

हरेक इंसान अपने भीतर व्यवहार का एक मानक बनाए रखता है। यह मानक खुद उसके अनुभवों की देन हो सकता है। कई बार वह अपने आसपास के समाज को देखकर भी ऐसे मानक बना लेता है। लेकिन वह कभी इन मानकों पर खुद को नहीं आंकता। इसकी बजाय वह उन मानकों को अपने विरोधियों पर लागू करता है। इस तरह वह जीवन भर खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को कमतर साबित करने की चेष्टा करता है। पर अपने ऐसे प्रयास में वह कुछ दूसरी गलतियां कर बैठता है।

विरोधियों के कार्य, जीवन और शैली में कमियां निकालने के उद्देश्य से जब वह उनका बहुत करीब पहुंचता है, तो अक्सर वह खुद भी अपने विरोधियों जैसा हो जाता है। हालांकि खुद उसे यह बात महसूस नहीं होती, पर वह वे सारे आचरण अपने व्यवहार में उतार चुका होता है, जिनके वह खिलाफ रहा होता है। दूसरों का विरोध करने की जगह अगर व्यक्ति खुद का विरोध कर सके, तो वह श्रेष्ठ इंसान बन सकता है।

संजय वर्मा

Thursday, 23 July 2009

छिपाने की कला

जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ता गया है, व्यक्तित्व के भी नए-नए मानदंड विकसित हुए हैं या कहें कि सांचे तैयार हो गए हैं। हर आदमी इस कोशिश में रहता है कि वह किसी सांचे में फिट हो जाए। इसके लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। लेकिन दूसरी तरफ उनके मन में तरह-तरह के स्वप्न आकार लेते रहते हैं, भाव उमड़ते रहते हैं। विचित्र-विचित्र आकांक्षाएं पैदा होती रहती हैं। लेकिन इस बारे में कोई कम ही बात करता है क्योंकि ये बातें किसी सांचे के अनुकूल नहीं होतीं बल्कि प्रतिकूल ही होती हैं। इसलिए आजकल मन की बातें बताने का चलन खत्म हो गया है।

लोग उन्हें अपने भीतर ही सीमित रखना चाहते हैं। उन्हें छिपाते हैं। हम जो भी बातें करते हैं, उनमें इस बात का खासतौर से ध्यान रखते हैं कि अपने भीतर की वे सहज, अनगढ़ इच्छाएं कहीं झलक न जाएं। यानी हम छिपाते ज्यादा हैं। जो हमारा सहज और स्वाभाविक है, उसे छिपा लेना एक कला का रूप लेता जा रहा है।

संजय कुंदन

छूट की हद

कोई छूट पाना या उसे पाने की कोशिश करना हम में से बहुतों का सपना होता है। देर से पहुंचने की छूट, कीमत में छूट, योग्यता में छूट- ऐसी तमाम छूटें पाकर हमें लगता है कि हमने अपना जीवन दूसरों की तुलना में थोड़ा आसान बना लिया है।

पर अक्सर यह बात भ्रम ही साबित होती है कि छूट ने हमें कोई सहूलियत दी है। छूट के सिद्धांत को व्यापार के गणित के नजरिए से देखें, तो इसके निहितार्थ का खुलासा हो जाता है। अगर कोई वस्तु हमें छूट पर दी जा रही है, तो साफ है कि या तो वह वस्तु चलन से बाहर हो गई है या फिर प्रतिस्पर्द्धा में उसका बाजार मूल्य उतना नहीं रह गया है जितना हमें दिखाई देता है। यानी किसी तरह उसे ग्राहक तक पहुंचा देने की मजबूरी उसकी कीमत में छूट दिला रही है। जब ये मजबूरियां नहीं रहतीं, तो वही वस्तु सामान्य के मुकाबले कई गुना अधिक कीमत पर मिलती है। निष्कर्ष यह है कि आज हम अगर व्यवहार में या अपनी योग्यता में कोई छूट पा रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि श्रेष्ठ विकल्प के अभाव में हमें ढोया जा रहा है। जिस वक्त वह श्रेष्ठ विकल्प मिल जाता है, छूट पा रहे लोगों को हाशिये पर धकियाए जाने में समय नहीं लगता।

संजय कुंदन

Thursday, 28 May 2009

साधारणता की खोज

जब किसी महत्वपूर्ण या स्थापित व्यक्ति को हम सहज होकर मिलते या साधारण बातें करते देखते हैं तो हमें अच्छा लगता है और हम उसकी प्रशंसा करते हैं। तब हमें वह ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगता है और हम कह बैठते हैं -वह सचमुच महान है। यानी वह असाधारण व्यक्ति हमें ज्यादा प्रभावित करता है, जो साधारण नजर आता है।

जैसे बच्चों के साथ खूब घुल-मिलकर बात करने वाले राजनेता की एक अलग पहचान बन जाती है। मृदुभाषी होना किसी राजनेता का विशिष्ट गुण हो जाता है। कोई फिल्म स्टार अगर सामान्य कपड़े पहनता है और अपने संघर्षमय अतीत को हमेशा याद रखता है, तो आम आदमी उससे ज्यादा निकटता महसूस करता है। यानी साधारणता ही व्यक्ति की मूल कसौटी है। किसी का साधारण होना यह दर्शाता है कि वह कितना मानवीय है और लोग अपने नायकों को मानवीय देखना चाहते हैं। कोई कितना भी प्रतिभावान क्यों न हो, अगर वह मानवीय नहीं है तो उसे व्यापक स्वीकृति नहीं मिल पाती। शायद यही वजह है कि हम महान व्यक्तियों के विचार से ज्यादा उसके जीवन प्रसंगों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। असल में हम उनमें साधारणता की खोज कर रहे होते हैं।

संजय कुंदन

Thursday, 21 May 2009

आकलन से ज्यादा

ऊपरी तौर पर समस्त प्रकृति में हर चल-अचल चीज की एक निश्चित भूमिका और एक निश्चित काम दिखाई देता है। इस आधार पर मान लिया जाता है कि बादलों का काम सिर्फ वर्षा करना या पेड़ों का सिर्फ छाया देना है। पर भूमिकाओं का निर्धारण करने वाला ऐसा आकलन अक्सर अधूरा होता है। पेड़ जिस जगह खड़ा है, वहां वह सिर्फ छाया नहीं करता, वहां की जमीन को उपजाऊ भी बनाता है, वहां की आबोहवा में अपने फूल-पत्तों से सुगंध और नरमाई भी घोलता है।

इसी तरह शरीर के अलग-अलग अंगों को ही लें। कान सिर्फ सुनता ही नहीं, क्या सुनना है क्या छोड़ना है- इस तरह का संपादन भी करता है। हाथ सिर्फ वजन नहीं उठाते, लेखन और कई कलात्मक कार्य करने के अलावा स्पर्श के माध्यम से दूसरे के अस्तित्व का अहसास भी हमें कराते हैं।

किसी चीज के बारे में अगर यह मान लिया गया है कि जितनी और जैसी भूमिका उसकी तय की गई है, वह उसी दायरे में रहेगा, तो यह हमारी भूल है। अक्सर ऐसे आकलन बड़ा झूठ साबित होते हैं और यह नतीजा हमारे सामने आता है कि जिसकी जो हैसियत, खूबी या कमी बताई जाती रही है, वह असल में उससे अलग है और निर्धारित की गई क्षमता से ज्यादा ताकत उसमें है।

संजय वर्मा

धारणाओं के पार

लोगों के बारे में कामचलाऊ राय बनाने के लिए अक्सर हम धारणाओं का सहारा लेते हैं। जज यानी न्याय में आस्था रखने वाला ईमानदार आदमी, फौजी यानी देश के लिए मर-मिटने वाला शेरदिल इंसान, कलाकार यानी कल्पना में खोया रहने वाला, वैज्ञानिक यानी चीजों की बारीकियां तलाशने वाला गैर-दुनियादार इंसान...वगैरह। ये धारणाएं हम कुछ पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर बनाते हैं और अक्सर इनके आधार पर ही लोगों से व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। अतीत में ऐसी धारणाएं जातियों के आधार पर बनाई जाती थीं।

जैसे ब्राह्मण यानी विद्वान, क्षत्रिय यानी पराक्रमी...आदि। जब भी ये धारणाएं टूटती थीं तब मूर्ख ब्राह्मण कथा जैसी कहानियां बन जाया करती थीं। इनसे पिछला स्टीरियोटाइप टूटता नहीं था, सिर्फ एक और स्टीरियोटाइप उसके साथ नत्थी हो जाता था। आज वैसा नहीं है। एक घूसखोर जज का मामला सामने आते ही लोग पूरी न्यायपालिका को शक की नजर से देखने लगते हैं और एक वैज्ञानिक को चंद्रग्रहण के वक्त नहाते देख सारे वैज्ञानिकों को पोंगा समझ लिया जाता है। लोगों को धारणाओं से बाहर इंसान की तरह देखना हम कब सीखेंगे?

चंद्रभूषण