Wednesday, 26 August 2009

अबूझ गति

जिस समय हम सोचते हैं कि सफलता की ऊंचाइयां हासिल करने जा रहे हैं, उसी वक्त कोई गहरी खाई तैयार हो रही हो ती है, जिसमें हम गिरने वाले हैं। जिस समय हम खुद को असहाय और डूबता हुआ समझ लेते हैं, उसी वक्त कोई तेज हहराती हुई लहर उठ रही होती है, जो हमें उछाल कर किनारे फेंक देने वाली है। मेंढक किसी पतंगे का निशाना साधते समय यह नहीं जानता कि उसके पीछे घात लगाए सांप सरक रहा है। और सांप नहीं जानता कि अचानक किस झाड़ी से निकल कर नेवला उसे दबोचने वाला है।

यह काल की अबूझ गति नहीं है। यह भाग्यवाद नहीं है। यह हमारी आंखों की, हमारी सूझ-बूझ और सतर्कता की सीमा है, जिसके आगे हम नहीं देख पाते। हम अपनी सफलता या असफलता के उस एक क्षण को अंतिम सत्य मान लेते हैं, जो कि सच नहीं होता। इसलिए उससे अलग कोई भी स्थिति हमें विस्मय से भर देती है।

Monday, 3 August 2009

विरोधी की तरह

हरेक इंसान अपने भीतर व्यवहार का एक मानक बनाए रखता है। यह मानक खुद उसके अनुभवों की देन हो सकता है। कई बार वह अपने आसपास के समाज को देखकर भी ऐसे मानक बना लेता है। लेकिन वह कभी इन मानकों पर खुद को नहीं आंकता। इसकी बजाय वह उन मानकों को अपने विरोधियों पर लागू करता है। इस तरह वह जीवन भर खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को कमतर साबित करने की चेष्टा करता है। पर अपने ऐसे प्रयास में वह कुछ दूसरी गलतियां कर बैठता है।

विरोधियों के कार्य, जीवन और शैली में कमियां निकालने के उद्देश्य से जब वह उनका बहुत करीब पहुंचता है, तो अक्सर वह खुद भी अपने विरोधियों जैसा हो जाता है। हालांकि खुद उसे यह बात महसूस नहीं होती, पर वह वे सारे आचरण अपने व्यवहार में उतार चुका होता है, जिनके वह खिलाफ रहा होता है। दूसरों का विरोध करने की जगह अगर व्यक्ति खुद का विरोध कर सके, तो वह श्रेष्ठ इंसान बन सकता है।

संजय वर्मा

Thursday, 23 July 2009

छिपाने की कला

जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ता गया है, व्यक्तित्व के भी नए-नए मानदंड विकसित हुए हैं या कहें कि सांचे तैयार हो गए हैं। हर आदमी इस कोशिश में रहता है कि वह किसी सांचे में फिट हो जाए। इसके लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। लेकिन दूसरी तरफ उनके मन में तरह-तरह के स्वप्न आकार लेते रहते हैं, भाव उमड़ते रहते हैं। विचित्र-विचित्र आकांक्षाएं पैदा होती रहती हैं। लेकिन इस बारे में कोई कम ही बात करता है क्योंकि ये बातें किसी सांचे के अनुकूल नहीं होतीं बल्कि प्रतिकूल ही होती हैं। इसलिए आजकल मन की बातें बताने का चलन खत्म हो गया है।

लोग उन्हें अपने भीतर ही सीमित रखना चाहते हैं। उन्हें छिपाते हैं। हम जो भी बातें करते हैं, उनमें इस बात का खासतौर से ध्यान रखते हैं कि अपने भीतर की वे सहज, अनगढ़ इच्छाएं कहीं झलक न जाएं। यानी हम छिपाते ज्यादा हैं। जो हमारा सहज और स्वाभाविक है, उसे छिपा लेना एक कला का रूप लेता जा रहा है।

संजय कुंदन

छूट की हद

कोई छूट पाना या उसे पाने की कोशिश करना हम में से बहुतों का सपना होता है। देर से पहुंचने की छूट, कीमत में छूट, योग्यता में छूट- ऐसी तमाम छूटें पाकर हमें लगता है कि हमने अपना जीवन दूसरों की तुलना में थोड़ा आसान बना लिया है।

पर अक्सर यह बात भ्रम ही साबित होती है कि छूट ने हमें कोई सहूलियत दी है। छूट के सिद्धांत को व्यापार के गणित के नजरिए से देखें, तो इसके निहितार्थ का खुलासा हो जाता है। अगर कोई वस्तु हमें छूट पर दी जा रही है, तो साफ है कि या तो वह वस्तु चलन से बाहर हो गई है या फिर प्रतिस्पर्द्धा में उसका बाजार मूल्य उतना नहीं रह गया है जितना हमें दिखाई देता है। यानी किसी तरह उसे ग्राहक तक पहुंचा देने की मजबूरी उसकी कीमत में छूट दिला रही है। जब ये मजबूरियां नहीं रहतीं, तो वही वस्तु सामान्य के मुकाबले कई गुना अधिक कीमत पर मिलती है। निष्कर्ष यह है कि आज हम अगर व्यवहार में या अपनी योग्यता में कोई छूट पा रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि श्रेष्ठ विकल्प के अभाव में हमें ढोया जा रहा है। जिस वक्त वह श्रेष्ठ विकल्प मिल जाता है, छूट पा रहे लोगों को हाशिये पर धकियाए जाने में समय नहीं लगता।

संजय कुंदन

Thursday, 28 May 2009

साधारणता की खोज

जब किसी महत्वपूर्ण या स्थापित व्यक्ति को हम सहज होकर मिलते या साधारण बातें करते देखते हैं तो हमें अच्छा लगता है और हम उसकी प्रशंसा करते हैं। तब हमें वह ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगता है और हम कह बैठते हैं -वह सचमुच महान है। यानी वह असाधारण व्यक्ति हमें ज्यादा प्रभावित करता है, जो साधारण नजर आता है।

जैसे बच्चों के साथ खूब घुल-मिलकर बात करने वाले राजनेता की एक अलग पहचान बन जाती है। मृदुभाषी होना किसी राजनेता का विशिष्ट गुण हो जाता है। कोई फिल्म स्टार अगर सामान्य कपड़े पहनता है और अपने संघर्षमय अतीत को हमेशा याद रखता है, तो आम आदमी उससे ज्यादा निकटता महसूस करता है। यानी साधारणता ही व्यक्ति की मूल कसौटी है। किसी का साधारण होना यह दर्शाता है कि वह कितना मानवीय है और लोग अपने नायकों को मानवीय देखना चाहते हैं। कोई कितना भी प्रतिभावान क्यों न हो, अगर वह मानवीय नहीं है तो उसे व्यापक स्वीकृति नहीं मिल पाती। शायद यही वजह है कि हम महान व्यक्तियों के विचार से ज्यादा उसके जीवन प्रसंगों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। असल में हम उनमें साधारणता की खोज कर रहे होते हैं।

संजय कुंदन

Thursday, 21 May 2009

आकलन से ज्यादा

ऊपरी तौर पर समस्त प्रकृति में हर चल-अचल चीज की एक निश्चित भूमिका और एक निश्चित काम दिखाई देता है। इस आधार पर मान लिया जाता है कि बादलों का काम सिर्फ वर्षा करना या पेड़ों का सिर्फ छाया देना है। पर भूमिकाओं का निर्धारण करने वाला ऐसा आकलन अक्सर अधूरा होता है। पेड़ जिस जगह खड़ा है, वहां वह सिर्फ छाया नहीं करता, वहां की जमीन को उपजाऊ भी बनाता है, वहां की आबोहवा में अपने फूल-पत्तों से सुगंध और नरमाई भी घोलता है।

इसी तरह शरीर के अलग-अलग अंगों को ही लें। कान सिर्फ सुनता ही नहीं, क्या सुनना है क्या छोड़ना है- इस तरह का संपादन भी करता है। हाथ सिर्फ वजन नहीं उठाते, लेखन और कई कलात्मक कार्य करने के अलावा स्पर्श के माध्यम से दूसरे के अस्तित्व का अहसास भी हमें कराते हैं।

किसी चीज के बारे में अगर यह मान लिया गया है कि जितनी और जैसी भूमिका उसकी तय की गई है, वह उसी दायरे में रहेगा, तो यह हमारी भूल है। अक्सर ऐसे आकलन बड़ा झूठ साबित होते हैं और यह नतीजा हमारे सामने आता है कि जिसकी जो हैसियत, खूबी या कमी बताई जाती रही है, वह असल में उससे अलग है और निर्धारित की गई क्षमता से ज्यादा ताकत उसमें है।

संजय वर्मा

धारणाओं के पार

लोगों के बारे में कामचलाऊ राय बनाने के लिए अक्सर हम धारणाओं का सहारा लेते हैं। जज यानी न्याय में आस्था रखने वाला ईमानदार आदमी, फौजी यानी देश के लिए मर-मिटने वाला शेरदिल इंसान, कलाकार यानी कल्पना में खोया रहने वाला, वैज्ञानिक यानी चीजों की बारीकियां तलाशने वाला गैर-दुनियादार इंसान...वगैरह। ये धारणाएं हम कुछ पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर बनाते हैं और अक्सर इनके आधार पर ही लोगों से व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। अतीत में ऐसी धारणाएं जातियों के आधार पर बनाई जाती थीं।

जैसे ब्राह्मण यानी विद्वान, क्षत्रिय यानी पराक्रमी...आदि। जब भी ये धारणाएं टूटती थीं तब मूर्ख ब्राह्मण कथा जैसी कहानियां बन जाया करती थीं। इनसे पिछला स्टीरियोटाइप टूटता नहीं था, सिर्फ एक और स्टीरियोटाइप उसके साथ नत्थी हो जाता था। आज वैसा नहीं है। एक घूसखोर जज का मामला सामने आते ही लोग पूरी न्यायपालिका को शक की नजर से देखने लगते हैं और एक वैज्ञानिक को चंद्रग्रहण के वक्त नहाते देख सारे वैज्ञानिकों को पोंगा समझ लिया जाता है। लोगों को धारणाओं से बाहर इंसान की तरह देखना हम कब सीखेंगे?

चंद्रभूषण

अवगुण का दुर्गुण

सत्य को सबसे बड़े मानवीय गुणों में गिना जाता है। पर सच को कटु या कड़वा भी कहा जाता है। अक्सर कहा जाता है कि सच्ची बात तो चुभेगी ही। आखिर सच का यह कैसा गुण है कि वह दिल पर बरछी सा प्रहार करे? क्या शायद इसीलिए कहीं-कहीं यह ताकीद की गई है कि ऐसा सच बोलिए, जो प्रिय हो? संभवत: अच्छे गुणों के साथ इन उपमाओं को जोड़ने का उद्देश्य सद्गुणों की महत्ता स्थापित करना होगा। असल में सद्गुणों का एक दुर्गुण यह है कि वह अपने साथ कोई न कोई अहंकार लाता है। सच के साथ कटुता का मेल इसी का नमूना है। सौंदर्य यानी रूप में भी दंभ रूपी अहंकार झलकता है। सुभाषित कहने वालों ने इस महीन गठजोड़ को पकड़ा है। इसीलिए उन्होंने सच की प्रियता की जरूरत की ओर इशारा किया है। सौंदर्य के साथ विनयशीलता जरूरी मानी है। चूंकि सच को मृदुता के साथ कहने वालों की बेहद कमी है और सच बोलने वाले ज्यादातर लोग अहं के शिकार हो जाते रहे हैं, इसलिए सच के साथ कटुता का मेल स्थापित हो गया और कड़वे सच की बात चलन में आ गई।

संजय वर्मा

Monday, 11 May 2009

प्रतियोगिता से मुक्ति नहीं

अक्सर यह बात कही जाती है कि आदमी होड़ में न पड़े। होड़ मनुष्य को गहरे तनाव में डाल देता है, असहज बना देता है। लेकिन क्या मनुष्य किसी भी होड़ से अपने को अलग कर पाता है?

मनुष्य अगर अपने को होड़ से अलग भी कर ले तो वह चैन से नहीं बैठ पाता। हो सकता है तब उसे अपना जीवन शिथिल और निरुद्देश्य लगने लगे। ऐसे लोग कम होते हैं जो अपनी हर तरह की इच्छा से निरपेक्ष होकर परम संतुष्ट जीवन जी सकें। हम ज्यों ही कोई कामना करते हैं, किसी न किसी प्रतियोगिता में उतर जाते हैं। अगर कोई खुद के लिए कुछ नहीं चाहता तो अपनी संतान के लिए इच्छा करता है। संतान को बेहतर जीवन देने की चाह में वह दूसरे की संतानों से उनकी तुलना करने लगता है और उन्हें अच्छे से अच्छा बनाने की होड़ में फिर उतर आता है। जीवन है, तो प्रतियोगिता है। इनसे घबराने से अच्छा है इन्हें स्वीकार किया जाए लेकिन अपनी इस वृत्ति पर नियंत्रण भी रखा जाए।

संजय कुंदन

हमारी अज्ञानता

हमें लगता है कि हम जिन चीजों के करीब रहते हैं, उनके बारे में सब कुछ जानते हैं। सचाई इसके विपरीत है। अकसर हम उन्हीं चीजों को नहीं जानते जिनसे हमारा रोज सामना होता है, जिन्हें हम रोज देखते हैं। जैसे यह संभव है कि कोई व्यक्ति उस सड़क के किनारे या आसपास की चीजों को कभी न देखे, जिससे होकर वह रोज दफ्तर जाया करता है।

हालांकि उन चीजों पर हमेशा उसकी नजर होती है लेकिन वह दिमाग से कहीं और होता है। वह समय पर दफ्तर पहुंचने के तनाव में होता है। वह यह सोच रहा होता है कि उसे कौन से काम निपटाने हैं, क्या-क्या करना है। इसी तरह शाम में घर लौटते हुए भी वह घर पहुंचने की जल्दी में होता है या किन्हीं और जरूरी चीजों में उलझा होता है। इस दौरान वह एक पेड़ को देखकर भी दरअसल उसे नहीं देख रहा होता है। रोज-रोज उसकी नजर अपने दफ्तर के ठीक बगल वाली दुकान पर पड़ती है लेकिन अगर उससे पूछा जाए कि उसके ऑफिस के ठीक बगल में क्या है, तो मुमकिन है वह न बता सके।

संजय कुंदन

भविष्य का भय

हम भविष्य के लिए अपनी तैयारियों को देखें तो पता चलेगा कि इसमें भय की बड़ी भूमिका है। हम पैसे बचाते हैं यह सोचकर कि कहीं अचानक कोई संकट आ गया तो! हम किसी मुश्किल में न पड़ें इसके लिए साधन जुटाते हैं। आम तौर पर हम यह नहीं सोचते कि संचित किए गए धन या साधन का कोई सार्थक इस्तेमाल करेंगे या अपने मन में दबी किसी योजना को मूर्त रूप देने के लिए इसका प्रयोग करेंगे या इससे और ज्यादा सुख हासिल करेंगे।

प्राय: लोग यह कहते हैं कि वे अपने बच्चों के लिए अर्जित कर रहे हैं। इसके पीछे भी वही भय है। उन्हें यह आशंका सताती रहती है कि अगर बच्चे अपने लिए कुछ हासिल न कर सके, तो क्या होगा। जाहिर है हमारी नकारात्मक सोच ही हमसे संचय करवाती है। अगर हमें भविष्य का भय न हो और अगर हम यह मानकर चलें कि कल सब कुछ बेहतर होने वाला है तो शायद हम संचय पर ध्यान ही न दें। हो सकता है इंसान की भागदौड़ तब कम हो जाए।

संजय कुंदन

Thursday, 23 April 2009

जो व्यावहारिक नहीं

हम मानते हैं कि कुछ चीजें व्यावहारिक हैं और कुछ अव्यावहारिक। इस विभाजन ने हमारे लिए बड़ी सुविधा पैदा कर दी है। जिस चीज को हम अपने अनुकूल नहीं पाते या जिस काम को करने में हमें कठिनाई होती है, उसे हम अव्यावहारिक कहकर उससे मुक्त हो लेते हैं। विचारों के साथ भी समाज ने यही सलूक किया है।

समाज ने उन्हें अव्यावहारिक बताकर उनके लिए एक पवित्र कोना निश्चित कर दिया है। उन लोगों को भी अव्यावहारिक बता दिया जाता है जो बदलाव या मूल्यों की बात करते हैं। व्यावहारिकता की अवधारणा दरअसल ताकत की अभिव्यक्ति है। हर दौर में प्रभावशाली लोगों ने अपने विचार और कृत्यों को व्यावहारिक घोषित किया और बाकी सब को अव्यावहारिक के खाते में डाल दिया।

इन ताकतवर लोगों के लिए कुल मिलाकर व्यावहारिकता का मतलब रहा-यथास्थितिवाद। लेकिन हर दौर में ऐसे 'अव्यावहारिक' लोग सामने आए जिन्होंने कथित व्यावहारिकता को चुनौती दी। उनकी कोशिशों से ही समाज में विकास के नए रास्ते खुले। अगर वे भी व्यावहारिक बनने के चक्कर में पड़ते तो समाज कभी आगे नहीं बढ़ता। इसलिए जो कुछ भी अव्यावहारिक बताया जा रहा है, उस पर ध्यान देने की जरूरत है। भविष्य की संभावनाएं उसी में छिपी हैं।

संजय कुंदन

संघर्ष जारी है

जब हम बुरे लोगों को अपने गलत मकसद के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते देखते हैं, तो हमें हैरत होती है। इसका एक निष्कर्ष यह है कि बुराइयां भी समय के साथ अपने को विकसित करती चलती हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो अपराधी बेहद पिछड़े हुए रह जाते और आसानी से परास्त कर दिए जाते। जिस तरह मानवता के हित में कुछ दिमाग सक्रिय हैं उसी तरह मानवता के विरोध में भी कुछ दिमाग सक्रिय हैं। दोनों तरफ एक जैसी शक्ति है एक जैसी ऊर्जा है। लेकिन मौलिकता सकारात्मक तत्वों के पास ही है।

ऐसा शायद ही कोई वैज्ञानिक आविष्कार हुआ होगा जिसकी मूल प्रेरणा गलत रही हो। किसी ने शायद ही यह सोचकर कोई मशीन बनाई होगी कि इससे वह चोरी करेगा। जो हथियार भी बनाए गए उसके पीछे एक बड़े समुदाय या राष्ट्र की रक्षा का भाव रहा। दरअसल पहले अच्छे मकसद से कोई तकनीक ईजाद की जाती है, बाद में उसका गलत इस्तेमाल होने लगता है। मतलब यह है कि सत्य और असत्य का शाश्वत संघर्ष आज भी जारी है चाहे मनुष्य कितनी ही तरक्की कर गया हो। देखना होगा कि हमारी प्रगति में कहीं कोई खोट तो नहीं कि असत्य निर्णायक रूप से पराजित नहीं हो रहा।

संजय कुंदन

Tuesday, 14 April 2009

बड़प्पन का अर्थ

ऐसे लोग बहुतेरे हैं जो अपनी उपलब्धियों का सही मूल्यांकन नहीं कर पाते और थोड़ी सफलता पाते ही अपने को बड़ा समझ बैठते हैं। उन्हें लगता है कि समाज भी उन्हें बड़ा मान रहा है और उनसे बड़ी अपेक्षाएं कर रहा है, इसलिए वे हर समय खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश में लगे होते हैं। वे जीवन के मामूली प्रसंगों को भी काफी ऊंचाई से देखते हैं और उनकी कोई अद्भुत व्याख्या करना चाहते हैं, ऐसी कि सब चौंक उठें, वाह-वाह कर उठें।

लेकिन इस प्रयत्न में वे प्राय: असहज हो जाते हैं और कई बार हास्यास्पद भी। लेकिन जो सही अर्थों में बड़ा व्यक्ति होता है, वह छोटी-छोटी चीजों को भी काफी गंभीरता से लेता है और उनमें रमता है। वह जीवन के छोटे प्रसंगों की उपेक्षा नहीं करता और उन्हें जबर्दस्ती व्यापक आयाम देने की कोशिश भी नहीं करता। लघुता का अपना एक सौंदर्य है, उसका अपना एक सुख है। इसका बोध एक सहज व्यक्ति को ही हो सकता है। दुनिया के ज्यादातर महापुरुषों के जीवन को देखें तो हम पाएंगे कि उन्होंने हरेक क्षण को भरपूर जीना चाहा। छोटी चीजें, छोटी बातें भी बड़प्पन की कसौटी हैं।

संजय कुंदन

Friday, 10 April 2009

खत्म नहीं होते शहर

कई बार कुछ महानगरों को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है कि अगर वहां बाहर से लोगों के आने का सिलसिला जारी रहा तो न जाने क्या होगा। दुनिया में ऐसे उदाहरण शायद ही मिलेंगे कि कभी किसी शहर के विकास की संभावना अचानक खत्म हो गई हो। हां, प्राकृतिक आपदाओं ने शहरों को जरूर चौपट किया लेकिन लोगों की बढ़ती संख्या के कारण शायद ही किसी शहर ने दम तोड़ा हो।

बल्कि उलटा ही हुआ है। उन शहरों ने ज्यादा विकास किया जहां हमेशा यह सवाल बना रहा कि अब अगर इसकी जनसंख्या और बढ़ी तो न जाने क्या होगा। लोगों की बढ़ती भीड़ ने जहां समस्या पैदा की, वहीं नई तकनीक और रहन-सहन के नए तौर-तरीके अपनाने को भी प्रेरित किया। नई जरूरतों ने ही फ्लाईओवर और मेट्रो हमें दिए।

असल में किसी शहर को भूगोल के बने-बनाए ढांचे में ही सीमित रखने की प्रवृत्ति के कारण इस तरह के सवाल उठते हैं। अगर हमारे जेहन में भूगोल की रेखाएं शिथिल पड़ जाएं और हम शहरों को उसके नाम के चौखटे से आजाद कर दें तो शायद कोई विवाद ही न रहे। आखिर मानव सभ्यता मनुष्य की जरूरतों और उसकी सहूलियत के हिसाब से ही बसती रही है और उसका ताना-बाना बदलता रहा है।

संजय कुंदन

Tuesday, 7 April 2009

जरूरत और दिखावा

रोटी, कपड़ा और मकान को इंसान की बुनियादी जरूरत समझा जाता रहा है। अमर्त्य सेन ने इस सूची को थोड़ा और बढ़ाया। उन्होंने शिक्षा को इसमें शामिल किया, साथ में उन सभी चीजों को, जिनके बगैर इंसान अपने दायरे में अलग-थलग पड़ जाता है। कंकड़ों से पांव को सुरक्षित रखने का काम हवाई चप्पल से भी चल जाता है लेकिन अगर किसी के दायरे में आने वाले सारे लोग जूते या चमड़े की चप्पलें पहनते हों तो हवाई चप्पल उसकी जरूरत पूरी नहीं कर पाती।
पड़ोस के हर घर में कलर टीवी आ जाने के बाद अच्छे-खासे ब्लैक ऐंड व्हाइट टीवी को भी कबाड़ में जाना पड़ता है और घर-घर में कार होने का दबाव एक दिन इसे भी बुनियादी जरूरतों की सूची में शामिल करा देता है। अगर कोई इस बात को लेकर बहुत सचेत हो कि वह अपने जीवन-व्यापार में दिखावे या विलासिता के लिए कोई जगह नहीं छोड़ेगा, तो भी जरूरतों के जाल में वह उलझता ही चला जाता है- हालांकि रोटी, कपड़ा और मकान से वंचित लाखों लोग तब भी उससे कुछ ही दूरी पर रह रहे होते हैं।

चंद्रभूषण

Tuesday, 31 March 2009

धारणाओं के पार

लोगों के बारे में कामचलाऊ राय बनाने के लिए अक्सर हम धारणाओं का सहारा लेते हैं। जज यानी न्याय में आस्था रखने वाला ईमानदार आदमी, फौजी यानी देश के लिए मर-मिटने वाला शेरदिल इंसान, कलाकार यानी कल्पना में खोया रहने वाला, वैज्ञानिक यानी चीजों की बारीकियां तलाशने वाला गैर-दुनियादार इंसान...वगैरह। ये धारणाएं हम कुछ पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर बनाते हैं और अक्सर इनके आधार पर ही लोगों से व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। अतीत में ऐसी धारणाएं जातियों के आधार पर बनाई जाती थीं। जैसे ब्राह्मण यानी विद्वान, क्षत्रिय यानी पराक्रमी...आदि। जब भी ये धारणाएं टूटती थीं तब मूर्ख ब्राह्मण कथा जैसी कहानियां बन जाया करती थीं। इनसे पिछला स्टीरियोटाइप टूटता नहीं था, सिर्फ एक और स्टीरियोटाइप उसके साथ नत्थी हो जाता था। आज वैसा नहीं है। एक घूसखोर जज का मामला सामने आते ही लोग पूरी न्यायपालिका को शक की नजर से देखने लगते हैं और एक वैज्ञानिक को चंद्रग्रहण के वक्त नहाते देख सारे वैज्ञानिकों को पोंगा समझ लिया जाता है। लोगों को धारणाओं से बाहर इंसान की तरह देखना हम कब सीखेंगे?
चंद्रभूषण

Friday, 27 March 2009

अरक्षित

अजीब रिवाज है! जो सक्षम है, बलशाली है- उसकी रक्षा के लिए त्योहार मनाया जाता है। जो शारीरिक रूप से कमजोर और स्वभाव से अहिंसक है- वह अरक्षित है। जो अपनी रक्षा भी कर सकता है और दूसरों का दमन भी करता है, उसकी रक्षा के लिए अभिमंत्रित सूत्र बाँधा जाता है। जो अपनी रक्षा नहीं कर पाती और दमन तथा शोषण दोनों का शिकार बनती है- उसकी हत्या की जाती है- भ्रूण में, निर्जन वन में और सभ्य जनों की चौपाल पर। अजीब रिवाज है कि जब वह हमें राखी का सूत बाँधती है और आशीष देती है तो देवी स्वरूप मानी जाती है और जब हमारे लिए ऐसा नहीं करती तो वह छलना और नरक का द्वार कही जाती है। अजीब रिवाज है कि उसके लिए रक्षा के सूत्र अभिमंत्रित नहीं किए जाते और उसकी रक्षा की कामना के लिए त्योहार नहीं मनाए जाते। तो क्या उससे स्नेह और शुभकामनाओं वाली राखी बँधवाते समय उसे रक्षा का वचन और आश्वासन दे कर हम फिर कोई नया प्रपंच रचते हैं?

अवगुण का दुर्गुण

सत्य को सबसे बड़े मानवीय गुणों में गिना जाता है। पर सच को कटु या कड़वा भी कहा जाता है। अक्सर कहा जाता है कि सच्ची बात तो चुभेगी ही। आखिर सच का यह कैसा गुण है कि वह दिल पर बरछी सा प्रहार करे? क्या शायद इसीलिए कहीं-कहीं यह ताकीद की गई है कि ऐसा सच बोलिए, जो प्रिय हो?

संभवत: अच्छे गुणों के साथ इन उपमाओं को जोड़ने का उद्देश्य सद्गुणों की महत्ता स्थापित करना होगा। असल में सद्गुणों का एक दुर्गुण यह है कि वह अपने साथ कोई न कोई अहंकार लाता है। सच के साथ कटुता का मेल इसी का नमूना है। सौंदर्य यानी रूप में भी दंभ रूपी अहंकार झलकता है। सुभाषित कहने वालों ने इस महीन गठजोड़ को पकड़ा है। इसीलिए उन्होंने सच की प्रियता की जरूरत की ओर इशारा किया है। सौंदर्य के साथ विनयशीलता जरूरी मानी है। चूंकि सच को मृदुता के साथ कहने वालों की बेहद कमी है और सच बोलने वाले ज्यादातर लोग अहं के शिकार हो जाते रहे हैं, इसलिए सच के साथ कटुता का मेल स्थापित हो गया और कड़वे सच की बात चलन में आ गई।

संजय वर्मा

Tuesday, 24 March 2009

माया और यथार्थ

प्लेटो ने कहा था कि यह विश्व यथार्थ नहीं है। वास्तविक जगत कहीं और है। हम जो देखते हैं, वह उस यथार्थ जगत की छाया है। कुछ लोगों को बैठे-बैठे अचानक संगीत या पायल या चूडि़यों की झंकार या किसी परिचित की आवाज सुनाई देती है। हालांकि वह संगीत आसपास कहीं नहीं बज रहा होता है, न कैसेट, न ग्रामोफोन, न डिस्क। वह व्यक्ति भी आसपास कहीं मौजूद नहीं होता। वह आवाज भी उस व्यक्ति विशेष के अलावा और किसी को सुनाई नहीं देती। क्या वह आवाज या संगीत व्यक्ति विशेष सिर्फ अपने मस्तिष्क में सुनता है? क्या वह उस वास्तविक जगत की किन्हीं ऐसी ध्वनियों को महसूस करता है, जिसे सुनने की क्षमता दूसरों के भीतर नहीं होती? विज्ञानी कहते हैं कि ध्वनि की ऊर्जा तरंगें होती हैं और वे धूमिल पड़ती हैं, पर तरंगें कभी समाप्त नहीं होतीं। क्या वे फिर से कभी घनीभूत होकर हमारे कानों से टकरा सकती हैं? किसी अंधेरी रात में कुत्ते सामूहिक रूप से अचानक क्यों रोते हैं, जबकि हमें कोई प्रत्यक्ष कारण नजर नहीं आता। क्या वे ऐसी ही किन्हीं ध्वनि तरंगों को महसूस करते हैं। वेदांत में जिस माया की बात की गई है, क्या यह उसी का आभासी है? किसी गंभीर गणित पर सोचते-सोचते सो जाते हैं और सुबह या सपने में हमें उसका हल मिल जाता है। क्या यह सब हेलुसिनेशन है? या उस वास्तविक जगत के प्रति हमारी चेतना का सक्रियता क्यों नहीं, जो दूसरों में विकसित नहीं हुई हो।

स्मृति से रिश्ता

हर व्यक्ति के भीतर विकास की प्रक्रिया चलती है। कई बार सायास तरीके से कई बार अनायास रूप में। हर आदमी अपने को बदलने की कोशिश में जुटा रहता है। इस क्रम में वह अपने ही भीतर की कई चीजों को छोड़कर आगे निकल जाना चाहता है। लेकिन चीजें छूटकर भी खत्म नहीं होतीं। वह हमारे अंदर अलग-अलग रूपों में जीवित रहती हैं। वह बार-बार वापस आती रहती हैं। शहर में बसने वाला व्यक्ति गांव लौटना नहीं चाहता। वह पूरी कोशिश करके ग्रामीण बोलचाल और रहन-सहन से पीछा छुड़ाता है। वह अपने को काटता-छांटता रहता है, ताकि वे चीजें उसके व्यक्तित्व में न झलकें। लेकिन शहर में लगने वाले विशेष मेलों में गांव की बनी दस्तकारी की चीजें वह शौक से खरीद कर लाता है और उसे ड्रॉइंग रूम में सजाता है। वह खुद भले भदेस भाषा का प्रयोग न करे, लेकिन जब फिल्म या विज्ञापन में कोई पात्र ऐसी भाषा बोलता है तो उसे अच्छा लगता है, वह उसका मजा लेता है। यानी उन चीजों के प्रदर्शनकारी स्वरूप को वह स्वीकार करता है। इसी कारण रहन-सहन में बदलाव के बावजूद हमारी जातीय स्मृतियां सुरक्षित रहती हैं।

जिसके पास कुछ नहीं है

मानव विकास के संबंध में जुटाए जाने वाले आंकड़ों और सर्वेक्षणों के जरिए आंकी जाने वाली गरीबी से जुड़े तथ्यों में यह बात कई बार सामने आती है कि दुनिया में असंख्य लोग हैं, जिनके पास जीवन यापन के लिए कुछ नहीं है। 'कुछ नहीं' की परिभाषा में घर-मकान, कपड़े-लत्ते और ऐसा रोजगार शामिल किया जाता है, जो नियमित आमदनी कराए। जाहिर है, इन चीजों के अभाव में हम ऐसे लोगों को घोर गरीब मान लेते हैं। पर क्या वे हर दृष्टि से गरीब होते हैं? जिनके पास कुछ नहीं होता, कई सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि वे दुनिया के सर्वाधिक अमीरों से ज्यादा प्रसन्न रहते हैं। इसीलिए यह जानने की कोशिश होती है कि जिनके पास कुछ नहीं है, उनके पास खुश होने को क्या है? अक्सर यह खोज बिना किसी नतीजे पर पहुंचे खत्म हो जाती है। दरअसल, जिनके पास कुछ नहीं होता, उनकी खुशी का कारण यही है कि उनके पास खोने को कुछ नहीं होता। खोने को कुछ नहीं होने के अहसास को हम तभी महसूस कर सकते हैं, जब हमारे पास वास्तव में कुछ न हो। पर क्या हम ऐसी खुशी पाने के लिए अपना बहुत कुछ दांव लगाने को तैयार हो सकते हैं?

संजय वर्मा

सच के चेहरे

सत्य और असत्य के संघर्ष की खूब बातें की जाती हैं। धर्मशास्त्रों से लेकर साहित्य तक का बुनि यादी विषय यही रहा है। लेकिन दुनिया में लड़ाई सिर्फ सत्य और असत्य के बीच नहीं है, बल्कि सत्य और सत्य के बीच भी है। हम एक सत्य को लेकर आगे बढ़ें तो मुमकिन है कोई हमारा विरोध दूसरे सत्य से करे। सत्य का कोई एक रूप नहीं होता। उसके भी कई चेहरे होते हैं। चूंकि जीवन में कसौटियां भी कई हैं, इसलिए सच के रूप भी अनेक हैं। किसी पुरानी पीढ़ी के व्यक्ति की कोई बात सच हो सकती है, लेकिन यह कोई जरूरी नहीं कि उसकी वह बात नई पीढ़ी का कोई व्यक्ति स्वीकार ही कर ले। दोनों अपनी-अपनी कसौटियों पर सही हो सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे को स्वीकार नहीं कर पाते। कई बार किसी खास समय में कोई सच ज्यादा प्रासंगिक और प्रभावी हो जाता है, जबकि कोई और सच गौण हो जाता है। इसलिए हम एक सच को स्वीकार करने के बावजूद उसे सामने नहीं लाना चाहते। हम उसी सच के साथ खड़े होते हैं, जो वर्तमान में हमारे काम आता है।

संजय कुंदन

Saturday, 21 March 2009

रंग और रंग

और तू जो चाहता है कि हर तरफ रंग ही रंग बिखरे हों, तो पहले एक सफेद चादर फैला। क्योंकि रंग उसी के आगोश में नजर आ सकते हैं। रंगों की चमक दे खने के लिए किसी वजूद का रंगहीन होना और उन रंगों के पीछे चुपचाप खड़ा हो जाना जरूरी है। और जो हर रंगीन पत्थर को देख कर तेरा मन ललचाता गया और तू उसे अपने दामन में समेटता गया, तो फिर तमाम रंगों के बावजूद वह बदरंग ही होगा, क्योंकि बहुत सारे रंगों को मिला भर देने से कोई खूबसूरत रंग-बिरंगा दृश्य नहीं तैयार होता, वह एक गंदला सा एहसास बन कर रह जाता है। और रंगों के बिखरने में जिस खूबसूरती का एहसास होता है, उसके पीछे एक तरतीब और एक साफ-शफ्फाफ जमीन की जरूरत होती है। बादलों से भरे आसमान में इंद्रधनुष नहीं उगता, गो कि सारे रंग वहीं होते हैं, उसके सात रंग बारिश से धुले आसमान में नीली जमीन पर उभरते हैं।

अपना बनाम दूसरों का नजरिया

यह एक सामान्य बात है कि हर आदमी का अपना-अपना नजरिया होता है। हर व्यक्ति अपनी नजर से सब कुछ को देखता है और अपनी जिंदगी जीता है। लेकिन अगर हमारे सामाजिक जीवन की पड़ताल की जाए तो पता चलेगा कि मनुष्य अपने जीवन में अपने नजरिए का कभी इस्तेमाल ही नहीं करता या यह भी कहा जा सकता है कि इसका उसे मौका नहीं मिलता। युवा जीवन से ही दूसरों के नजरिए से चलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। करियर चुनते वक्त इस बात का ध्यान रखा जाता है कि अमुक क्या कर रहा है। उसे देखकर ही उस जैसा या उससे बेहतर बनने की कवायद शुरू हो जाती है। इसी तरह पहनावे-ओढ़ावे में भी लोग इस बात का ध्यान रखते हैं कि आजकल चलन क्या है या सामने वाले ने क्या पहन रखा है। जीवन के हर छोटे-बड़े निर्णय को इसी तरह दूसरे प्रभावित करते हैं। अगर कोई यह हिसाब लगाने लगे कि उसने कितने फैसले अपनी मर्जी से लिए तो शायद उसे निराशा ही हाथ लगेगी। कभी मित्र, कभी पड़ोसी तो कभी भीड़ तो कभी समाज हमारे जीवन को तय करता है। लेकिन इसी में जो लोग अपने नजरिए से काम लेने का साहस दिखाते हैं, वे मनुष्यता को एक नई दिशा दे जाते हैं।

जीवन से जुड़ाव

मनोवैज्ञानिक इस बात पर काफी सिर खपाते रहे हैं कि जीवन से जुड़ाव या अलगाव की वजह क्या है। आमतौर पर यह माना जाता है कि जिन्हें जीवन में सब कुछ हासिल हो गया वे बेहद संतुष्ट रहते हैं और जीवन से उनका जुड़ाव बहुत ज्यादा होता है। लेकिन इसका उलटा भी होता है। कई बार घोर संतुष्ट व्यक्ति के जीवन में भी एक अलगाव सा आने लगता है, क्योंकि उसके जीवन में प्राप्ति की जगह नहीं रह जाती। उसके भीतर यह अहसास आ जाता है कि अब तो सब कुछ पा लिया, अब बचा क्या? यह तृप्ति भी कई बार जीवन के प्रति उत्साह कम कर देती है। इसलिए प्राप्ति की चाह का होना बेहद जरूरी है। जो लोग भौतिकता का निषेध करते हैं वह भी आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति या सिद्धि की चाह रखते हैं। इसलिए जीवन के प्रति उनमें उत्साह कायम रहता है। कई समृद्ध देशों में आदमी का बढ़ता अकेलापन इसी वजह से है। वहां भौतिकता से मिली तृप्ति के बाद प्राप्ति का कोई दूसरा संदर्भ नहीं पैदा होता। उनके सामने एक ही लक्ष्य होता है और उसके करीब आते ही जीवन के प्रति उत्साह में कमी आ जाती है।

रहस्य का होना

दुनिया में सबसे चर्चित कथाओं में उनका शुमार होता है, जिनमें अंत तक रहस्य कायम रहता है। रहस्य से दिलचस्पी जगती है और जब तक रहस्य का तोड़ न मिल जाए, चैन नहीं आता। प्रकृति में कई रहस्य थे और हैं। इंसान उन रहस्यों का तिलिस्म तोड़ने को बेताब है। इंसान खुद भी कई रहस्य बनाता है, दूसरे लोगों को उन रहस्यों-पहेलियों को हल करने में मजा आता है। इससे लगता है कि रहस्यों का होना हमारे जीवन के लिए जरूरी है। रहस्य न होते, तो जिंदगी कितनी बेरंग और बेमजा होती। जैसे अगर बिजली हमें यूं ही मिल गई होती, तेल भंडारों को हमें खोजना नहीं पड़ता। एक क्रमिक अनुसंधान से हमने इन रहस्यों को जाना है और उनका लुत्फ उठा रहे हैं। रहस्यों को सुलझाने में एक आनंद है। पर जब हमारे ही आसपास कोई व्यक्ति आम सामाजिक व्यवहारों से अलग हटकर रहस्यमय आचरण करता है, तो वह हमारे दिमागों में खटकता है। उसके रहस्यों से हमें बेचैनी होती है। हो सकता है कि ऐसा इंसान अपनी ही पहेलियों में गुम हो, पर जरा सोचें, अगर हम खुद ही पहेली बन गए होते, तो दुनिया के रहस्यों को कौन बूझता?

संजय वर्मा

होड़ भी जरूरी है

कई लोग मानते हैं कि एक-दूसरे से आगे निकलने की हड़बड़ी ने ही हमारा सुख-चैन छीन लिया है। चूंकि आजकल हर आदमी एक होड़ में शामिल है, इसलिए वह हरदम तनाव में रहता है। तो क्या प्रतिद्वंद्विता समाप्त हो जाने पर मनुष्य के सारे दुख समाप्त हो जाएंगे? कहना मुश्किल है, लेकिन जो लोग होड़ को गलत मानते हैं उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि आगे बढ़ने के लिए कोई लक्ष्य जरूरी है। लक्ष्य हवा में नहीं पैदा होते। उसके बनने में कई चीजों का योगदान होता है। हम किसी को देखकर उसके जैसा बनना चाहते हैं और यही इच्छा हमारा मकसद तय करती है। अगर कोई प्रतिद्वंद्वी ही न हो तो आगे बढ़ने की ललक नहीं पैदा होगी। किसी दबाव के अभाव में आदमी शिथिल पड़ने लगता है और बड़े काम करने से कतराता है। फिर वह जोखिम नहीं लेता और सुविधाजनक रास्ते तलाशने लगता है। इसलिए किसी प्रतिद्वंद्वी का होना भी जरूरी है। हम जिसे अपना आदर्श मानते हैं वह दरअसल हमारा प्रतिद्वंद्वी होता है। हम उसी के जैसा बनना चाहते हैं या उससे आगे निकलना चाहते हैं। होड़ ने सभ्यता को आगे बढ़ाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

संजय कुंदन

Friday, 20 March 2009

असहमति से दोस्ती

आदमी को जोड़ने वाली एक कड़ी है विचार। समान विचार वाले लोग एक साथ होते हैं, वे किसी समान मकसद को हासिल करने के लिए संगठित भी होते हैं। पर इसका मतलब यह नहीं कि हमें वही पसंद आता है जो हमारे विचार को मानने वाला हो या हमसे हर बिंदु पर सहमति रखता हो। अगर ऐसा होता तो किसी खास विचारधारा को मानने वाले दल में भी कई गुट नहीं होते। यानी विचार हमें जोड़ने वाला एक सूत्र है, एकमात्र सूत्र नहीं। व्यक्ति और व्यक्ति को जोड़ने वाले अनेक तत्व होते हैं, जिन्हें पहचानना आसान नहीं है। कई बार हमारे विचार से असहमति रखने वाला आदमी हमें बेहद आकर्षित करता है। असल में हम कई चीजों को पाना चाहते हैं। हमारी इच्छाएं हमें दूसरों से जोड़ती हैं। संभव है कोई व्यक्ति सुंदर दिखना चाहता हो। अगर उसे भव्य व्यक्तित्व वाला कोई विरोधी मिलता है तो भी वह उससे प्रभावित होता है। मुमकिन है दोनों में गहरी मित्रता भी हो जाए। वहां वैचारिक असहमति से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

संजय कुंदन

सरल नहीं, कठिन

जीवन में जो चीजें और बातें सबसे सरल दिखती हैं, वे असल में उतनी सरल नहीं होतीं, जितना हम उन्हें मानने लगते हैं। जैसे कि दो का पहाड़ा। एक वयस्क, अनुभवी,पढ़ेलिखे व्यक्ति से दो का पहाड़ा सुनाने को कहना मानो उसकी हंसी उड़ाना है। पर जरा उसी व्यक्ति को उसके बचपन में देखिए। मां ने, पिता ने या घर के बड़े-बुजुर्गों में से किसी ने उसे उसके बालपन में बड़ी कोशिशों से दो का सरल दिखने वाला पहाड़ा याद कराया होगा। इसी तरह, स्लेट पर उसने अनगिनत बार जो आड़ी-तिरछी रेखाएं खींची होंगी, उन्हें अक्षरों की शक्ल में ढालना खुद उसे पहाड़ खोदने जैसा काम लगा होगा। अपने पांवों पर उठ खड़ा होना और चलना शुरू करना या आगे चलकर साइकल का संतुलन साधना और उसे चलाना- ये सब भी उस वक्त महान चुनौतियां रही होंगीं। पर उस वक्त इन्हीं कठिन दिखने वाली बातों के आधार पर आगे के सारे काम आसान होते चले जाते हैं और एक दिन दो का पहाड़ा बेहद तुच्छ लगने लगता है। असल में सरलता को समझना और सरल होना ही सबसे कठिन बात है। यहां तक कि इंसान की सरलता भी दो के पहाड़े जितनी ही कठिन है।

सुख और दुख

आपको यह अजीब लग सकता है, लेकिन जिंदगी में सुख की अहमियत का पता हो या न हो, दुख की अहमियत लगभग सभी ने मान ली है। दुख को ऐसी भट्ठी माना गया है, जिससे आत्मा का सोना आकार लेता है। लेकिन सुख? क्या वह सिर्फ दुख का नहीं होना है? या फिर, जैसा कि साइंटिस्ट कहते हैं, एक इनाम है, जो हमें संसार में अच्छा बर्ताव करने के लिए मिलता है? जो भी हो, लेकिन वह जीवन का मकसद नहीं हो सकता, जैसा कि बहुत से लोग मानते हैं। इसलिए कि शाश्वत सुख, ऐसा सुख जिस पर दुखों की छाया कभी पड़ती ही न हो, मुमकिन नहीं है। प्रैक्टिकल ही नहीं, सैद्धांतिक तौर पर भी, क्योंकि तब तो सुख का अहसास ही नहीं रहेगा। जिस सुख ने दुख न जाना हो, वह पैदा हो ही नहीं सकता, इसीलिए जबर्दस्त रूप से सुख भोग रहे लोग भी जिंदगी से आजिज आ जाते हैं। सुख की महिमा जितनी हो, इस विडंबना से नहीं बचा जा सकता।

संजय खाती

नायक और खलनायक

अंडा और मुर्गी की तर्ज पर यह प्रश्न भी उठाया जा सकता है कि पहले नायक शब्द बना या खलनायक। वैसे ज्यादा उम्मीद है कि दोनों एक साथ प्रचलन में आए होंगे। देखा जाए तो इन दोनों में कोई खास फर्क नहीं है। जो एक समूह विशेष के लिए नायक हो सकता है वही किसी दूसरे समुदाय के लिए खलनायक भी हो सकता है। यह बात हमारे मिथकों से भी साबित होती है। अब मिथकीय चरित्र प्रमथ्यु को ही लें। कहा जाता है कि उसने स्वर्ग से आग चुराई। स्वर्ग के बाशिंदों की नजर में वह एक अपराधी था पर मानव जाति के लिए उससे बड़ा नायक और कौन होगा जिसने आग जैसी बुनियादी चीज उपलब्ध की। इस बारे में वक्त भी अपना फैसला सुनाता है। एक समय अपने देश के लिए हीरो रहा हिटलर बाद में विलेन साबित हुआ। इसका उलटा भी होता है। एक काल विशेष में खलनायक रहा आदमी एक समय के बाद जाकर नायक भी बन जाता है क्योंकि उस दौर में समाज की सोच और प्राथमिकताएं बदल जाती हैं।

थोड़े से बेईमान

मौसम के साथ एक अजीब तोहमत हम इंसानों ने जोड़ दी है। उसे कई मौकों पर बेईमान बताया जाता है, हालांकि उसकी इस बेईमानी में कई रंग हैं और इसके आशय भी हम खुद जोड़ते हैं। जैसे अगर मौसम बेईमान है, तो जरूरी नहीं कि लू के थपेड़ों वाला मौसम हो या हाड़ कंपाने वाली ऋतु हो। बल्कि इसका मतलब हो सकता है कि मौसम बहुत खुशगवार है। यानी यह बेईमानी ऐसी है कि इसमें बेईमानी से कहीं ज्यादा शराफत झलकती है। पर गौर करें कि अगर कहा जाता कि आज मौसम बड़ा शरीफ है, तो भला कोई उसकी ईमानदारी पर यकीन करता? जाहिर है, इस बेईमानी में नेकनीयती ज्यादा है। हम हो जाएं बेईमान, क्योंकि हमें खुद से, अपनों से, गैरों से कोई ऐसा बर्ताव करना है कि दुनिया-जहान का दिल हमारी इस बेईमानी पर खुश हो ले। हम हो जाएं बेईमान, क्योंकि हमें साबित करना है कि ईमानदारी और सचाई का क्या मोल है। और ऐसे हों, कि लोग हमारी इस बेईमानी पर न्यौछावर हो जाएं। यकीन मानिए कि मौसम की तरह बेईमान होना कोई गुनाह नहीं है।

संजय वर्मा

जैसे टूटा चश्मा

कई बार दया स्वत: नहीं जगती। उसे प्रयास करके जगाना पड़ता है। पर यह कोशिश कई बार इतनी कृत्रिम हो जाती है कि मदद की अपेक्षा कर रहे व्यक्ति को इसके लिए खरी-खोटी सुननी पड़ती है। उसे दुत्कार दिया जाता है। हमें समझ में आ जाता है कि कोई गुहार बनावटी है या वास्तव में व्यक्ति को मदद की जरूरत है। पर यह भी सही है कि दुनिया में सभी समर्थ नहीं हो सकते और इसीलिए मदद की अपीलों का एक स्पेस है। जो लोग साधनहीन हैं, उनके लिए स्वयंसेवी संगठन समर्थ लोगों से मदद की अपेक्षा करते हैं। लेकिन यह काम और टेढ़ा है। उनकी अपील के भी अनसुना रह जाने का खतरा होता है। पर जब यही काम बिना किसी बनावट के किया जाता है, तो हमारे हाथ स्वत: ही मदद के लिए उठ जाते हैं। वृद्धों के पुनर्वास और भरण-पोषण की अपील के साथ जब कोई टूटा चश्मा सामने रखा जाता है, तो हमारा हृदय उस अपील पर दवित हो उठता है। कहने को टूटे चश्मे के साथ की गई अपील में प्रफेशनलिज्म का अभाव है, एक अपूर्णता उसमें झलकती हैं, पर ऐसी अपीलों की अपूर्णता ही अपने मकसद को ज्यादा साधती है।

संजय वर्मा

व्यवस्था के रूप

जीवन में व्यवस्थित होने का अपना महत्व है। बच्चों को बताया जाता है कि वे जीवन की हर छोटी-मोटी चीजों में व्यवस्था का ध्यान रखें। लेकिन इतनी सतर्कता के बावजूद हर आदमी के जीवन में एक जैसी व्यवस्था नहीं आ पाती, बल्कि ऐसे असंख्य लोग मिलेंगे जिनकी जीवन शैली में घोर अव्यवस्था पाई जाती है। जो घोर व्यवस्थित जीवन जी रहे होते हैं वे भी कभी-कभी अपने जीवन में बनी-बनाई व्यवस्था को तोड़कर जीना चाहते हैं। इसके लिए वे बेसब्री से छुट्टियों का इंतजार करते रहते हैं। अपनी बनाई लीक को कुछ समय के लिए तोड़ देने से उन्हें बड़ी राहत मिलती है। तो क्या आदमी बुनियादी तौर पर अव्यवस्था में रहना पसंद करता है? क्या वह व्यवस्था को एक बोझ की तरह महसूस करता है? असल में हर समाज अपने अनुकूल एक सिस्टम तैयार करता है। हर व्यक्ति उसे स्वीकार करता है क्योंकि उसे समाज में रहना है। लेकिन उस सिस्टम से परे एक और व्यवस्था हर आदमी के भीतर रहती है जो उसे संचालित करती है। अब यह जरूरी नहीं कि वह आंतरिक व्यवस्था समाज के पैटर्न से भी मेल खाए। इसलिए जो ऊपर से अव्यवस्थित दिख रहा होता है वह भी एक अलग व्यवस्था से संचालित होता है।

संजय कुंदन

हवा की तरह

खुद में वह कुछ नहीं है, पर वह है, तभी तो जीवन है। उसका अपना कोई रंग नहीं। धूल का कोई गुबार उठे, तो उस गुबार का रंग हवा में दिखने लगता है। उसकी कोई गंध नहीं। फूलों की बगिया से निकलती है, तो सारा माहौल महक उठता है। किसी गंदे नाले के करीब से होकर गुजरने पर वह दुर्गंध को अपने संग इसलिए ले चलती है कि सुगंध-दुर्गंध का फर्क तो अज्ञानी करते हैं। हवा के चलने में अपना कोई स्वार्थ नहीं होता। वायुमंडल में कहीं कोई शून्य पैदा होता है, तो हवा उसे भरने भागती है। एक ओर वह विशाल बादलों को यहां से वहां ठेलती है, तो दूसरी ओर हर जीवित छोटे से छोटे प्राणी की सांस का अवलंब बनती है। और कमाल देखिए कि जहां वह न हो, तो यह सुविधा उसके साथ जुड़ी है कि हाथ से पंखे को जरा सा इधर-उधर हांकिए और पैदा कर लीजिए हवा। बिजली की तरह उसे पैदा करने में कोई खास जतन नहीं करना पड़ता। कोई कीमत नहीं मांगती हवा। पर जितनी आसान है हवा, उतना ही मुश्किल है हवा की तरह होना।

संजय वर्मा

कोयल की कूक

एक दिन दिल्ली की एक पुरानी कोठी के पास से गुजरते हुए कोयल के कूकने की आवाज सुनी। अद्भूत अनुभव था यह। याद नहीं आ रहा था कि कितने सालों के बाद सुना था कोयल का इस तरह कूकना। अकस्मात कुछ काव्य पंक्तियां कौंध गईं। कोयल के बारे में सोचते हुए कालिदास याद आते हैं। उनकी रचनाओं में आम्र मंजरियां खूब आती हैं। अब दिल्ली में आम्र मंजरियों का सुख तो फॉर्म हाउस वाले ही उठा सकते हैं। आम आदमी के जीवन में न तो आम के बगीचे हैं न कोयल जैसे दूसरे पक्षी। ऐसा भी नहीं है कि महानगर में पक्षी हैं ही नहीं। उन्हें देखने वाली आंख चाहिए। दिल्ली गेट पर कबूतरों की पांत हमारा मन मोह लेती है। पर हमारे पास इतना समय कहां है कि हम ठहरकर उनका उड़ना-चहकना देखें और उल्लसित हों। हमारे सुख के संदर्भ बदल गए हैं। हम प्रकृति और उसके उपादानों में अपने लिए सुख की तलाश नहीं करते। शहरों के पार्कों में भी हमारा ध्यान पेड़ और चिड़ियों पर नहीं रहता, वहां भी हम चिप्स खाने, कोल्ड ड्रिंक्स पीने या अपने भौतिक जीवन की चिंताओं में निमग्न हो जाते हैं।

संजय कुंदन

खुले दरवाजों की ताकत

कल्चर को बचाना है, तो सारे खिड़की-दरवाजे खोल दीजिए। उन तमाम लोगों से सहमत होना मुश्किल है जो इस या उस कल्चर पर बाहरी हमले को लेकर भड़के रहते हैं और चाहते हैं कि बीच में एक दीवार खड़ी कर दी जाए। एक कल्चर पर दूसरी कल्चर का हमला आज की बात नहीं है। जब से सभ्यता शुरू हुई है, यह होता आया है। और हुआ यह भी है कि जिसने अपनी कल्चर को किले में बंद करके घेरना चाहा, वह हमेशा हारता रहा। जैसे संदूक में बंद करके भी कपूर को उड़ने से नहीं बचाया जा सकता, वैसे ही कल्चर भी नहीं बचती। तो हमले से बचने का उपाय है कि निशाना बनने के लिए कुछ छोड़ें ही नहीं। वही कल्चर बची हैं, जो बिना पहरे के छोड़ दी गईं, और इसलिए गंध की तरह दुनिया भर में फैल गईं। उनका किसी से टकराव नहीं हुआ और किसी ने उनका विरोध नहीं किया।

संजय खाती

सीखे को भूलें

प्राय: सभी धार्मिक उपदेशक और सदाचार से जुड़े ग्रंथ मनुष्य को नकारात्मक प्रवृत्तियों से बचने की सलाह देते हैं। पर कहीं यह ठीक-ठीक नहीं बताया जाता कि आखिर लालच और झूठ जैसी बुरी आदतें और भय के समान नकारात्मक वृत्तियां इंसान में कहां से आती हैं। क्या वे जन्मजात पैदा होती हैं? या उन्हें वक्त के साथ-साथ हम अपने आसपास के माहौल से सीखते हैं? इसका कोई सटीक उत्तर भले ही नहीं दिया जा सके, पर ज्यादा संभावना इसी बात की बनती है कि हम ऐसा नकारात्मक व्यवहार अपने परिवार और समाज से ही सीखते हैं। और आगे चलकर इनका असर कई बार इतना ज्यादा होता है कि हम इनके बंदी जैसे हो जाते हैं। यह आश्चर्य ही है कि सीखी हुई ये वृत्तियां मनुष्य पर हावी हो जाती हैं। जो उपदेशक हमें इन नकारात्मक वृत्तियों से बचने की सलाह देते हैं, अगर वे ज्यादा जोर इस बात पर दें कि कैसे इन्हें सीखने से बचा जाए,तो शायद सदाचार ज्यादा प्रभावी हो सके। या कोई ऐसा तरीका वे विकसित कर सकें, जिससे कि सीखने की प्रक्रिया में अच्छा आचरण बुरी आदतों पर प्राथमिकता पा सके, तो शायद भय और लालच अपनी ही मौत मर सकेंगे। सीखे हुए ऐसे व्यवहारों को भुला सकने वाली ऐसी शिक्षा या उपदेश ज्यादा सार्थक हो सके हैं।

संजय वर्मा

Thursday, 19 March 2009

करें दुश्मनी

इंसान के रूप में  मिले जीवन में हमें कई टारगेट पाने होते हैं। पर जो अनूठा करना चाहते हैं, जिन्हें लगता है कि जीवन सिर्फ चुनिंदा मकसद पाने के लिए नहीं बना, जिन्हें लगता है कि वे लीक से हटेंगे, तो ही कोई बात बनेगी- वे चाहें तो अनूठा काम करने के लिए दुश्मनी ही कर लें। पर इसके लिए भी एक टारगेट तय करना होगा। यह पहचान करनी होगी कि कौन होगा हमारा दुश्मन। यह तो नहीं हो सकता कि जिन दोस्तों की हमें सतत जरूरत है, हम उन्हें ही अपना दुश्मन बना लें। इसलिए यहां एक लिस्ट है, जिसमें से आप अपने मतलब का दुश्मन चुन सकते हैं- ये हैं काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, ईर्ष्या, तृष्णा और आलस्य। आप कहेंगे कि ये तो बहुत जाने-पहचाने नाम हैं, इसमें अनूठापन क्या है। पर गौर करें कि सारी जिंदगी जब भी हम अपने दुश्मन तय करते हैं, इनमें से कोई हमारे निशाने पर नहीं होता, अक्सर निशाने पर वे होते हैं जो खुद ही इनके शिकार हैं।

संजय वर्मा

आखिरी क्षण

पूरी ताकत से जलता है बुझता हुआ दीया। उसकी वह आखिरी लपट देखिए। लगता है
कि जीवन की सारी शक्ति सोखकर वह दीया उस अंतिम क्षण में, विदाई की उस
वेला में पूरे संसार को रोशन कर जाना चाहता है। जला तो वह पूरे जीवन है,
पर आखिरी वक्त में उसकी लौ में चमक कई गुना बढ़ जाती है। कहने को यह उसका
आखिरी पल है, पर इस आखिरी पल में देखिए कि कितना जीवन है, कितना स्पंदन
है। जितनी चमक पूरे जीवन में बिखेरी, शायद उतनी ही या शायद उससे ज्यादा
चमक जाते-जाते वह बिखेर जाना चाहता है। बेशक, उसका ईंधन चुक गया है, उसे
यह भी मालूम है कि हवा का कोई मामूली झोंका उसका अंत कर देगा, पर वह इन
आखिरी लम्हों को इस दुख में रीता नहीं जाने देता। वह जलता है, पूरी ताकत
से जलता है। हम मान लें कि जो यह पल है, आखिरी पल है, और तब जीएं। तब
महसूस होगा कि साधारण ढंग से जीने और पूरे जोश के साथ जीने में क्या फर्क
है।

कबूतरबाज हीरो

हो सकता है बरसों बाद लोग किताबों में बाबूभाई कटारा का जिक्र पढ़ें और
हैरान हो जाएं। इसलिए नहीं कि एक सांसद ने कबूतरबाजी की यानी लोगों को
अवैध तरीके से विदेश ले जाने का गुनाह किया, बल्कि इसलिए कि सन 2007 में
सीमाओं के आरपार लोगों की आवाजाही पर पाबंदी हुआ करती थी। दरअसल एक दिन
कबूतरबाजी रहेगी ही नहीं, क्योंकि सीमाएं खुल चुकी होंगी और लोग बिना
किसी रोक-टोक के उन्हें पार कर रहे होंगे। मसलन एक जमाना था जब गुलामी भी
कानूनी थी, जो आज हमें एक गलत प्रथा लगती है। इस लिहाज से देखें तो कटारा
जैसे लोग एक ऐसे सिस्टम को तोड़ रहे हैं, जो होना ही नहीं चाहिए था और एक
दिन रहेगा भी नहीं। हो सकता है तब कटारा को बदलाव का हीरो माना जाए।
कबूतरबाजों का कसूर यह है कि वे पाबंदी वाले इस सिस्टम को तोड़ने का काम
निजी फायदे के लिए कर रहे हैं। लेकिन अपराध तो यह इसीलिए है न, क्योंकि
एक गलत सिस्टम मौजूद है।

नए का डर

हम प्राय: नई चीजों को संदेह की नजरों से देखते हैं। नएपन को लेकर हमारे भीतर एक तरह का अविश्वास होता है। यहां तक कि नई पीढ़ी के आचार-विचार हमें अटपटे लगते हैं। नौजवानों के साथ कभी अकेले समय गुजारना पड़े तो उनका व्यवहार संकोच में डाल देता है। हम अंदर-अंदर ही शरमाते हैं। हम उनसे एक दूरी बना लेते हैं। भले ही हमारा उनसे भावनात्मक लगाव हो, लेकिन उनके रहन-सहन के तौर-तरीके और सोच पर हम गहरी आपत्ति करते हैं। गौर करें तो नई पीढ़ी में यह जो कुछ आया है वह उन्होंने अपनी पुरानी पीढ़ी से ही ग्रहण किया है। उनकी जो चीजें हमें अस्वाभाविक लगती हैं, उनके बीज कहीं न कहीं हमारे ही भीतर मौजूद रहे हैं। मुश्किल यह है कि हम उन्हें दोषी तो ठहराते हैं, लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करते कि ये सब उनके भीतर आया कहां से। हम भूल जाते हैं कि वर्तमान की जड़ें अतीत में ही हैं। इसलिए अगर हम नई पीढ़ी को समझना चाहते हैं तो हमें अपने भीतर भी झांकना चाहिए। खुद को पहचाने बगैर हम नई पीढ़ी को नहीं समझ पाएंगे।

संजय कुंदन

Wednesday, 18 March 2009

जो जहां है, कुछ तो मजा है

इस बात के लिए हमें ईश्वर का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने हर प्राणी को जिंदगी का लुत्फ उठाने लायक बनाया है। एक मामूली सी चींटी भी अपने ढंग से जिंदगी का मजा लेती है। यही बात इंसानों पर भी लागू होती है। ऐसा नहीं है कि फूलों का मजा सिर्फ वही ले सके, जो बागों का मालिक है। फूलों का असली आनंद तो माली लेता है। शहरों में रहने वालों के पास ढेरों सुविधाएं क्यों न हों, मगर कदमों पर प्रकृति और खर्च करने को ढेर समय होने का मजा तो गांवों में रहने वाले ही लेते हैं। हर काम के साथ कोई न कोई लाभ जुड़ा ही रहता है। मंत्री जी का जितना रुतबा होता है, उनके पर्सनल असिस्टेंट का रुतबा भी उतना ही बढ़ जाता है। सब्जी उगाने वाले किसानों को रोज खेतों से ताजा तोड़ी गई सब्जी की पौष्टिकता लेने से कौन रोक सकता है। मोची क्यों नहीं अपने बच्चों के लिए शानदार जूते बनाएगा, जुलाहा अपनी प्रेमिका के लिए सुंदर वस्त्र और बढ़ई चूल्हे में खटती अपनी पत्नी को क्यों नहीं आरामदायक चौकी बनाकर देगा?

सुंदर चंद ठाकुर

सत्ता और आनंद

सत्ता और आनंद में हमेशा पारस्परिक बैर रहा है। आनंद सत्ता को नहीं देखता, उसे लांघ जाता है। उसकी सीमाएं राष्ट्र की सत्ता से कहीं आगे ब्रह्मांड की सत्ता तक फैली हैं। सत्ता आनंद की दुश्मन है, क्योंकि आनंद हमेशा से उसके अस्तित्व पर हमला करता आया है। सत्ता को मालूम है कि उसे बचाने वाले अंतत: दुखी, परेशान, गरीब लोग ही हैं, जिन्हें वह भविष्य के स्वप्न दिखाकर अपने वश में किए रख सकती है। इसलिए दुनिया में जहां जहां सत्ताएं हैं, सरकारें हैं, वहां दुखियारों, पीडि़तों, गरीबों का होना तय है। सारी प्रजा अगर धनवान हो गई, सारी प्रजा अगर आनंद में रहने लगी, तो कौन सेना में भतीर् होगा, कौन देश के लिए युद्ध लड़ेगा। अमेरिका धनवान होते हुए भी अपने यहां इतनी गरीबी बचाए हुए है कि उसकी सेनाएं भरीपूरी बनी रहें। जिसके भीतर आनंद उतर जाए वह बहादुरी के पुरस्कारों और मैडलों के प्रलोभन में इराक, वियतनाम या अफगानिस्तान क्यों जाएगा?

सुंदर चंद ठाकुर

दो कदम पीछे

अक्सर पीछे लौटना मुश्किल होता है। अपनी जमी-जमाई पॉजिशन छोड़कर कदम पीछे खींचना अपमानजनक महसूस होता है। पर पीछे लौटना एक स्ट्रैटिजी है। आगे बढ़ने के ख्वाहिशमंद हैं, तो कदमों को लौटाने का हुनर सीखिए। दुश्मन से जंग में पीछे लौटना कई बार बेहद बुद्धिमानी का काम होता है। हम पीछे लौट रहे हैं, यानी दुश्मन को ऐसी खाई की तरफ न्योत रहे हैं, जहां का चप्पा-चप्पा हमारा जाना-पहचाना है। हम पीछे लौट रहे हैं, यानी आगे बढ़ने के लिए एक ठोस जमीन तैयार कर रहे हैं। जब आगे बढ़ना बेहद मुश्किल हो रहा हो, तो पीछे लौट कर ही हम पाते हैं कि आगे बढ़ने के लिए अब किस और योग्यता व ताकत की जरूरत है। पीछे लौटने पर ही हमें यह अहसास हो पाता है कि आगे बढ़ने की हमारी कोशिश में कितनी खामियां थीं। अगर ललक आगे बढ़ने की हो, तो पीछे लौटने पर हम में आगे बढ़ने का नया जोश पैदा हो सकता है। लेकिन यह पीछे लौटना किसी गर्त में गिर पड़ना नहीं है। इस तरह पीछे लौटकर तो खुद को नए संकल्प के लिए तैयार करना है। इसलिए पीछे लौटें, तो इस तरह लौटें कि आगे बढ़ने की हर बाधा खत्म हो जाए। आगे बढ़ने की हर अड़चन मामूली बन जाए।

संजय वर्मा

भूलना मतलब याद करना

एक समय ऐसा आता है जब हम बहुत कुछ भूलने लगते हैं। विस्मरण बढ़ती उम्र और तनाव की देन है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि हम उन्हीं चीजों को भूलते हैं जिन्हें हमारा मन स्वीकार नहीं करना चाहता। असल में रोजमर्रा की जिंदगी में हम मन के विपरीत बहुत सी चीजें ओढ़ लेते हैं। हमारे जीवन में कई ऐसी अनचाही चीजें शामिल हो जाती हैं जिनसे अवचेतन में हम छुटकारा पाना चाहते हैं। इनका बोझ हमें भुलक्कड़ बना देता है। और एक दिन हम पाते हैं कि हम उन्हीं चीजों को भूलते जा रहे हैं जिन्हें हम अपने लिए सबसे आवश्यक मानते हैं। दरअसल हम जिन्हें अपने लिए आवश्यक समझ रहे होते हैं, उसे हमारा मन रिजेक्ट कर रहा होता है। यानी भूलना एक तरह से याद दिलाना भी है। विस्मरण हमें याद दिलाता है कि अपने मन की सुनो। अपने मन के मुताबिक थोड़ा तो जीकर देखो। अगर हम अपने मन की पुकार सुनें तो भूलना कम कर देंगे।

संजय कुंदन

Tuesday, 17 March 2009

काम और पहचान

एक व्यक्ति एक ही काम करते-करते ऊब जाता है और उससे मुक्ति की बात सोचने लगता है। शायद इसीलिए छुट्टी की व्यवस्था की गई ताकि लोग अपनी थकान मिटा आएं और फिर से तरोताजा होकर अपने मूल काम में जुट जाएं। लोग तरोताजा होने के लिए घूमते फिरते हैं, मनोरंजन करते हैं।

अगर किसी के पास यह सुविधा हो कि वह जब चाहे अपना काम बदल ले तो क्या वह बदल लेगा? शायद नहीं। अगर ऐसा होता तो दुनिया में विशेषज्ञता की अवधारणा नहीं आई होती। काम बदलने की एक तो गुंजाइश कम है लेकिन इसके लिए हमारा शरीर और मन तैयार भी नहीं होता।

हमें एक ही काम की आदत पड़ जाती है और हमें लगता है कि हम कुछ और नहीं कर सकते। दरअसल यह आदत से ज्यादा हमारी पहचान का मामला है। हर व्यक्ति अपने काम से अपनी एक पहचान बनाता है। लेकिन यह पहचान समाज के लिए नहीं अपने लिए भी होती है। हम अपने लिए भी अपनी एक पहचान बनाते हैं। हमारा काम दरअसल हमें हमारी एक पहचान देता है। इसलिए हम उस काम को छोड़ना नहीं चाहते क्योंकि उससे हमारी पहचान मिटने का खतरा रहता है।

संजय कुंदन 

Monday, 16 March 2009

त्योहारों का सच

किसी त्योहार के आने के कुछ समय पहले तक लोग प्राय: यह कहते पाए जाते हैं कि अब त्योहार मनाने का अर्थ ही क्या रह गया है, जीवन इतना कष्टप्रद और असुरक्षित हो गया है कि सारे पर्व बेमानी हो गए हैं। कोई महंगाई को कोसता है तो कोई हाल के किसी हादसे का हवाला देकर पर्व से दूर रहने की बात करता है। लेकिन ज्यों-ज्यों त्योहार नजदीक आने लगता है, ये सारे तर्क कमजोर पड़ने लग जाते हैं और आखिरकार ध्वस्त हो जाते हैं।

हर व्यक्ति पर्व में किसी न किसी रूप में शामिल हो ही जाता है। असल में हम दुख-तकलीफ को स्वीकार तो करते हैं, पर उससे मुक्ति के रास्ते भी ढूंढते रहते हैं। काफी मुश्किलों से घिरा आदमी भी हंसने के बहाने खोज ही लेता है। मनुष्य मूलत: उत्सवधर्मी है। अगर वह कष्टों और विघ्न-बाधाओं को ही अंतिम सत्य मानकर बैठ गया होता, तो शायद सभ्यता आगे न बढ़ती। मनुष्य ने अपनी तमाम कठिनाइयों के बीच भी उत्सव मनाए। सारे त्योहार दरअसल दुख के खिलाफ प्रतिरोध हैं। हम त्योहार मनाकर विसंगतियों को चुनौती देते हैं और उन्हें हराने की तैयारी करते हैं।

संजय कुंदन 

नए की चाह एक भ्रम

अक्सर जब हम किसी से मिलते हैं, तो पूछते हैं कि 'और नया क्या चल रहा है?' ऐसा लगता है कि सब चाहते हैं कि कुछ नया होता रहे, जीवन की एकरसता टूटती रहे। लेकिन इसी के समानांतर हम तमाम चीजों को एक निश्चित बंधे-बंधाए फ्रेम में भी देखना चाहते हैं। जैसे किसी घर में खिड़कियों और दरवाजों की जगह ईंट-पत्थर की दीवारें हों और दीवारों की जगह खिड़कियों के शीशे लगे हों तो वह हमें पसंद नहीं आएगा। लंबे बालों वाले लड़कों और घुटे सिर वाली लड़कियों को देख कर हमें अटपटा लग सकता है।

होली के दिन किसी को अपने घरों को दीपों से सजाते हुए देख कर हम भौंचक रह जाएंगे। यदि थ्री-पीस सूट पहन कर आया मेहमान अंग्रेजी में हुक्का मंगाने का अनुरोध करे या किराए के लिए लड़ रहा रिक्शावाला अचानक धारा प्रवाह अंग्रेजी बोलना शुरू कर दे, तो हम हतप्रभ रह जाएंगे। असल में हम नयापन चाहते हैं, पर उससे डरते भी हैं। हम पुरानी चीजों को बदलना चाहते हैं, लेकिन उन्हीं के साथ सुरक्षित भी महसूस करते हैं।

बामुसि 

Friday, 6 March 2009

अव्यावहारिकता की जरूरत

आजकल व्यावहारिक होने  पर बड़ा जोर है। व्यावहारिकता का तकाजा यह है कि व्यक्ति रोजमर्रा जीवन का हर कार्य एक निश्चित व्यवस्था के तहत करे। व्यावहारिक लोग आमतौर पर सामाजिक नियमों-कायदों और रीतियों का आंख मूंदकर पालन करते हैं। किसी को व्यावहारिक कहने में यह भाव रहता है कि वह भावना की बजाय बुद्धि को महत्व देता है, लीक से हटकर नहीं चलता क्योंकि उसमें जोखिम है।

एक तरह से देखा जाए तो व्यावहारिक होने का अर्थ है जोखिम न लेना। माना जाता है कि जो जोखिम लेगा वह गिर सकता है, नाकामयाब हो सकता है। इसलिए कहा जाता है कि प्रैक्टिकल बनो। लेकिन गौर करने की जरूरत है कि यह सभ्यता तभी आगे बढ़ी जब लोगों ने रिस्क लिए। जो लीक छोड़कर चले उन्होंने ही नई लीक बनाई जिस पर आज दुनिया चल रही है।

व्यावहारिक आदमी की मुश्किल यह है कि वह नाप-जोख कर चलता है। वह अपनी कल्पना को ताले में बंद रखता है, वह कई बार अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल तक नहीं करता। वह अपनी हर योजना किसी न किसी सांचे को ध्यान में रखकर बनाता है। इसलिए ऐसे लोग छोटी-मोटी उपलब्धियां तो पा लेते हैं, लेकिन कोई बड़ा काम नहीं कर पाते। जीवन में थोड़ी अव्यावहारिकता भी जरूरी है।

संजय कुंदन 

रहस्य और भय

अंतरिक्ष के बहुत  से रहस्य अभी खुलने बाकी हैं। स्पेस के बारे में हम रोज ही कोई न कोई नई जानकारी पाते हैं। इन जानकारियों से अंतरिक्ष के बारे में हमारे ज्ञान का दायरा बढ़ा है और आगे भी बढ़ेगा। क्या स्पेस में कहीं जीवन है या अगर कहीं जीवन था, तो वह कैसे खत्म हुआ- इसका पता चलेगा। दूसरी तमाम जानकारियों की तरह ही अंतरिक्ष के बारे में मिलती नई-नई सूचनाएं भी सभ्यता को और उन्नत और सुरक्षित बनाती हैं।

पर दूसरी तरफ यह भी लगता है कि इनसे हमारे भीतर का भय और कुछ हद तक एक तरह का अंधविश्वास भी बढ़ रहा है। अंतरिक्ष में घूमता हर ज्ञात एस्टेरॉयड मानो पृथ्वी से टकराकर हमें नष्ट करने वाला है। मंगल या दूसरे ग्रहों पर जब पानी के सूख जाने के प्रमाण मिलते हैं, तो लगता है कि ऐसा एक दिन पृथ्वी पर भी होने वाला है।

हमारी स्थिति उस अबोध शिशु की तरह है, जिसे सर्प से तब तक कोई भय प्रतीत नहीं होता, जब तक उसे खतरे का अहसास नहीं कराया जाता। और जब एक बार वह सांप के खतरे से परिचित हो जाता है, तो वह विषहीन सांपों से भी डरने लगता है। अंतरिक्ष से हम इसलिए भयभीत होते हैं, क्योंकि उसके बारे में हमारा ज्ञान आधा-अधूरा है। लेकिन ज्ञान कभी पूर्ण भी नहीं होता।

संजय वर्मा

परीक्षा को नहीं बनने दें पर इच्छा

परीक्षा के बारे में यह आम धारणा है कि इसमें हमारी इच्छा या सुविधा से कुछ नहीं होता, जो भी होता है 'पर इच्छा से' होता है। एक दम अप्रत्याशित। हमें दूसरों के विवेक के अनुसार स्वयं को योग्य सिद्ध करना होता है। यही वजह है कि इसे लेकर हमारे मन में एक भय घर कर लेता है। जब भी हम किसी परीक्षा के लिए जाते हैं, हमारे सामने उसके अनुसार खुद को ढालने की चुनौती रहती है। पर तैयारी के उन्हीं क्षणों में परीक्षा महज 'पर इच्छा नहीं' रह जाती।

दरअसल, वहीं से हम अपने युक्ति, तर्क और कौशल से उस 'पर इच्छा' पर काबू पाने की शुरुआत करते हैं, जो कभी कल्पनाओं में भी हमें डराया करती थी। कौन कितनी जल्दी इस पर काबू पाता है या अपना प्रयास छोड़ बैठता है, यह तो निश्चय ही हमारे स्वभाव पर निर्भर करता है। पर आगे परीक्षक का नहीं हमारा मैदान होता है। परीक्षक हमारे लिए जो ताना-बाना बुनता है, वह उससे आगे नहीं जा सकता। हमारी योग्यता नापने के लिए बनाया गया वही पैमाना परीक्षक की सीमा बन जाती है। लेकिन हम आगे निकल सकते हैं -अपनी तैयारी से, अपने प्रदर्शन के दौरान। आगे बढ़ने का आखिरी अवसर परीक्षार्थी के पास ही होता है।

अनुराग वत्स 

विरोध का डर

हर व्यक्ति दूसरे पर प्रभाव जमाना चाहता है। वह चाहता है कि उसे लोगों की सराहना मिले। हर कोई लोकप्रिय होना चाहता है। यह इच्छा ही लोगों के व्यवहार को नियंत्रित करती है। बहुत से लोग लोकप्रिय होने या प्रशंसा बटोरने के लिए भी सदाचरण करते हैं। वे भलाई करते हैं, मीठी बोली बोलते हैं, हमेशा हंसते रहते हैं। लेकिन प्रशंसा हासिल करने के चक्कर में वे कई बार समझौते करते हैं और अपने मन के विपरीत काम करते रहते हैं।

जो लोग दूसरों को नाराज करने का साहस नहीं रखते, वे जीवन में कोई जोखिम भी नहीं ले पाते। उन्हें विरोध से डर लगने लगता है। वे ऐसा कोई कदम उठाना ही नहीं चाहते, जिस पर किसी को आपत्ति हो। इसलिए ऐसे लोग लोकप्रिय होने के बावजूद एक सीमित दायरे में कैद हो कर रह जाते हैं। समाज में वे पसंद जरूर किए जाते हैं, लेकिन वे समाज के लिए उपयोगी नहीं रह जाते। समाज के लिए उपयोगी तो वे होते हैं जो विरोध की परवाह नहीं करते और अलोकप्रिय तथा अलग-थलग पड़ जाने का खतरा उठाकर भी बड़े फैसले करते हैं और अपना रास्ता खुद बनाते हैं।

संजय कुंदन 

भय की भूमिका

कहा जाता है कि आज का इंसान बेहद डरा हुआ है। जीवन के हर मोड़ पर भय का कोई न कोई संदर्भ जरूर मौजूद है। हर व्यक्ति अपने को असुरक्षित महसूस कर रहा है। लेकिन सुरक्षा का भी कोई अंतिम मानक नहीं है। कोई यकीन के साथ नहीं कह सकता कि उसे कितनी सुरक्षा चाहिए।

हो सकता है कोई व्यक्ति अपनी जान की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह निश्चिंत हो, लेकिन यह भी मुमकिन है कि वह भावनात्मक रूप से खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा हो। कई लोग अकेलेपन से डरते हैं। मतलब यह कि जीवन में भय की उपस्थिति बेहद अहम और निर्णायक है। कई बार असुरक्षा का भाव हमसे कई तरह के काम करवा ले जाता है।

व्यक्ति जो कुछ भी अर्जित करता है, दरअसल उसके पीछे स्वयं को सुरक्षित बनाने का भाव होता है। सुरक्षा की तलाश में ही व्यक्ति विद्या हासिल करता है धन हासिल करता है, समाज में अधिक से अधिक लोगों से संपर्क कायम करने की कोशिश करता है। अगर भय या असुरक्षा न रहे तो संभव है व्यक्ति शिथिल पड़ जाए या उसके प्रयासों में गहराई न रह जाए।

संजय कुंदन 

Thursday, 5 March 2009

बीते का शुक्रिया

यह विडंबना ही है कि  जिस भविष्य को अक्सर आशंकाओं के साथ देखा जाता है, जिसके बारे में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जाता है, उस भविष्य का सभ्यता जोरशोर से स्वागत करती है। बेशक, भविष्य सपने जगाता और उम्मीदें बंधाता है, पर अतीत के बरक्स वह बिल्कुल फुसफुसा होता है। अमूर्त भविष्य का स्वागत हम शायद इस उम्मीद के साथ करते हैं कि जो आशंकाएं उसके साथ जुड़ी हैं, वे मूर्त रूप में परिणत नहीं हों। इसलिए अच्छा हो कि जो बीत गया है, हम उसका शुक्रिया अदा करें। अच्छा या बुरा, जैसा भी वक्त बीता- कम से कम वह हमारे सामने पूरी तरह स्पष्ट होता है।

तीत में जो कुछ बुरा हुआ, हम चाहें तो उससे कोई सबक ले सकते हैं। जो अच्छी बातें हुईं, कामना कर सकते हैं कि वे हमारे जीवन में बार-बार घटित हों। सच तो यह है कि भविष्य के मुकाबले बीता हुआ वक्त ज्यादा सार्थक और स्पष्ट होता है। कम से कम उसमें कोई अनिश्चय तो नहीं होता, कोई उलझन उसमें नहीं बचती। आइए, जरा पलटकर बीते हुए को देखें और इसका शुक्र मनाएं कि तमाम आशंकाओं, चिंताओं, दुविधाओं के बावजूद वह जो छोड़ गया है, उसी पर आप अपने भविष्य के किले बनाएंगे।

संजय वर्मा

खुद को छुपाते हुए

किसी को कोई जानकारी या ज्ञान देना अच्छी बात है पर कुछ लोग अपना ज्ञान दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं। वे हर समय इस ताक में लगे रहते हैं कि उन्हें ज्ञान के प्रदर्शन का अवसर मिले। ऐसे लोग बिना किसी संदर्भ के भी कई बार कोई प्रसंग छेड़ देते हैं और इस क्रम में अपनी समस्त जानकारियां उड़ेल देते हैं। लेकिन यह दिखाने से ज्यादा अपने को छुपाने की कोशिश है।

व्यक्ति अपने ज्ञान का प्रदर्शन करके दरअसल अपने अज्ञान को छुपा रहा होता है। जो लोग अपने को किसी न किसी स्तर पर हीन समझते हैं, वे उसे ढकने के लिए ही इस तरह का प्रदर्शन करते हैं। वे सामने वाले का ध्यान अपनी उस कमी से हटाना चाहते हैं। इसलिए वे अपने पास अर्जित तमाम सूचनाओं को एक चादर की तरह ओढ़ लेते हैं।

ज्ञान बघारने वाला व्यक्ति भले ही ऊपरी तौर पर आत्मविश्वास से भरा नजर आए लेकिन उसके भीतर आत्मविश्वास की बेहद कमी होती है। लेकिन वह इस कमी को भी छुपाने की पूरी कोशिश करता है। जो सही मायने में ज्ञानी होता है उसे अपना ज्ञान दिखाने की जरूरत ही नहीं महसूस होती क्योंकि उसे कुछ छुपाना नहीं होता है।

संजय कुंदन 

छोटी नहीं, बड़ी

हमारी रोजाना की  दिनचर्या में ऐसी सैकड़ों चीजें और बातें शामिल हैं, जो हैं तो महत्वपूर्ण इतनी कि उनकी अनुपस्थिति हमारी दिनचर्या को बिगाड़ सकती है, पर उन पर हमारा ध्यान नहीं जाता।

अक्सर यह होता है कि उन छोटी चीजों के योगदान का हम नोटिस नहीं लेते। इस कायदे से हमें हर छोटी-छोटी बात और वस्तु की महत्ता पर गौर फरमाना चाहिए। किसी बड़ी मशीन का एक छोटा सा पुरजा भी इतनी उपयोगी भूमिका में हो सकता है। लेकिन अगर हम हर छोटी चीज पर ध्यान देंगे, तो उसी के छोटे से संसार में सिमट कर रह जाएंगे। हमारी दृष्टि उसी छोटे से दायरे में सिमट कर रह जाएगी। असल में जब हमारी नजर किसी छोटी सी चीज पर जाती है, तो वह छोटी नहीं, किसी बड़ी भूमिका में होती है। अगर कोई छोटी चीज महत्वपूर्ण है, तो असल में उस समय वह छोटी नहीं, बड़ी है। इसीलिए जब कोई चीज छोटी लगे, तो उस समय वह सचमुच छोटी और तुच्छ है और उस पर ध्यान न देना ही श्रेयस्कर है।

संजय वर्मा

नियम बनाम रिश्ते का बंधन

हम सच का  आदर करते हुए भी कई बार उसका पालन नहीं करते, उसमें थोड़ी छूट लेते हैं। यह जरूरी नहीं कि इसके पीछे हमारा कोई गलत मकसद हो। हम अकसर अपने किसी आत्मीय को राहत पहुंचाने के लिए ऐसा करते हैं। हम सोचते हैं अगर नियम-कायदों में थोड़ी ढील दे देने से किसी का भला हो जाए तो क्या हर्ज है।

हालांकि दुनिया में ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने नियमों के पालन करने में किसी तरह का समझौता नहीं किया और अकेले पड़ जाने का जोखिम उठाया। यह एक आदर्श स्थिति है, लेकिन ऐसा करने वाले लोग कम होते हैं। आम तौर पर लोग सिद्धांत से ज्यादा मानवीय संबंध को महत्व देते हैं। अगर संबंधों के रास्ते में सिद्धांत आते हैं तो वे उसे भी छोड़ देते हैं।

दरअसल संबंध बनाना मनुष्य होने की शर्त है। इंसान रिश्तों के ताने-बाने में जीना चाहता है। वह ज्यादा से ज्यादा लोगों का प्यार अर्जित करना चाहता है। यही वजह है कि कोई भी व्यवस्था अपनी मूल अवधारणा के करीब तो होती है पर हूबहू वैसी नहीं होती। नियम-कायदे सापेक्षिक रूप से ही सफल होते हैं। मनुष्य को बांधा तो जा सकता है पर उसकी भी एक हद है।

संजय कुंदन  

समय और हम

समय के बारे में हम कल्पना करते हैं कि वह किसी नदी की तरह है। जैसे नदी में जल की धारा प्रवाहित होती है, समय या काल भी प्रवाहित होता है। आज इस क्षण किसी घाट पर नदी का जो जल बहता हुआ पहुंचा है, वह कल या अगले ही क्षण यहां इस घाट पर मौजूद नहीं होगा। वह आगे निकल जाएगा- अगले घाट की ओर। इसीलिए लोकभाषा में कहते हैं कि समय बीत गया, समय गुजर गया।

लेकिन जैसी हम कल्पना करते हैं, क्या सचमुच समय उस तरह से गुजर जाता है? क्या पता समय नहीं बीतता हो, हम ही बीत जाते हों। क्या पता काल सदा स्थिर रहता हो। क्योंकि हमारे बीत जाने का प्रमाण तो है। हमारी कोशिकाएं जवान होती हैं, बूढ़ी होती हैं और फिर मर जाती हैं। हमारा शरीर जर्जर हो जाता है। लेकिन काल स्थिर है या चलायमान, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। हम जिसे समय का परिवर्तन कहते हैं, वह तो असल में हमारे भीतर हो रहा परिवर्तन ही है।

बामुसि 

रंगमंच है जीवन

जीवन की तुलना रंगमंच से की गई है। कहा गया है कि जैसे अभिनेता विभिन्न चरित्रों को मंच पर जीते हैं उसी तरह हमें भी अपने जीवन के लिए कुछ भूमिकाएं दी गईं हैं, जिनका हमें निर्वाह करना है। नाटक में नेपथ्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नेपथ्य में ही अभिनेता सजते-संवरते हैं और अपने को किसी चरित्र में ढालते हैं।

जीवन में भी नेपथ्य का कम महत्व नहीं है। सच कहा जाए तो मंच से ज्यादा नेपथ्य का ही विस्तार है। हमारा मन दरअसल इसी नेपथ्य का हिस्सा है। इसमें न जाने कितनी चीजें पड़ी हुई हैं। इसमें तरह-तरह की इच्छाएं हैं, प्रयत्न हैं। आदमी जिस रूप में सामने दिखता है, वैसा ही वह नेपथ्य में भी हो, नहीं कहा जा सकता।

नेपथ्य से कौन सी चीज किस मकसद से निकली है, कहना मुश्किल है। हो सकता है व्यक्ति के किसी सदाचरण के पीछे कोई खतरनाक इच्छा छिपी हो। यह भी संभव है कोई व्यक्ति किसी सार्थक उद्देश्य से गलत फैसले कर रहा हो। असलियत तो नेपथ्य ही बता सकता है, जो अंधेरे में होता है और जिसका पता सिर्फ उस व्यक्ति को मालूम होता है।

संजय कुंदन 

असाधारणता का दुख

यह सच है कि सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य समाज में रहना चाहता है लेकिन अपने को श्रेष्ठ साबित करने के लिए वह समाज में रहकर भी खुद को उससे दूर दिखाता है। व्यक्ति ज्यों-ज्यों सफलता हासिल करता जाता है, वह समाज से कटने की कोशिश करने लगता है।

वह यह सिद्ध करने लगता है कि उस तक हर किसी की पहुंच आसान नहीं है। इसके लिए कई बार वह मौन का सहारा लेता है। वह अपने इर्द-गिर्द एक घेरा बना लेता है। बड़े होने का यह अहसास व्यक्ति के सामने कई तरह की समस्याएं पैदा कर देता हैं। वह अपने मन पर एक ताला जड़ देता है।

इस कारण उसकी कई इच्छाएं अंदर ही अंदर फड़फड़ाती रहती हैं। वह अपनी छोटी-मोटी आकांक्षाएं भी पूरी नहीं कर पाता। वह एक साधारण आदमी की तरह घूमना-फिरना और ठिठोली करना चाहता है, लेकिन चूंकि वह अपने को साधारण नहीं मानता इसलिए खुद को इनसे दूर रखता है। यानी असाधारणता का अहसास ही व्यक्ति को स्वाभाविक सुख से वंचित रखता है। लेकिन जो वाकई असाधारण होता है, वह इस तरह के छद्म में नहीं जीता और निर्द्वंद्व होकर अपनी हर इच्छा पूरी करता है।

संजय कुंदन 

अच्छे को अच्छा कहना

हम में से ज्यादातर लोग यह दावा करते हैं कि वे अच्छे को अच्छा तथा बुरे को बुरा कहने में कभी नहीं झिझकते। वे कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति में कोई सद्गुण है, तो वे खुल कर उसकी प्रशंसा करते हैं। और यदि कोई अवगुण है, तो बेखौफ उसके दोष बताते हैं। पर इस दावे में ज्यादा सचाई नहीं होती।

असलियत में गुण-दोष का हमारा विवेचन हमारे अपने राग-द्वेष से संचालित होता है। इस मामले में हम अक्सर छल ही करते हैं, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति या वस्तु से हमारा अच्छा संबंध है, तो उसकी जरा सी अच्छाई भी हमें महान लगती है। यहां तक कि उसके दुर्गुणों को भी हम अच्छे रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं।

पर अपने पड़ोसी या उस व्यक्ति से जुड़ी कोई भी चीज भली मालूम नहीं पड़ती, जिससे हम किसी भी कारणवश खार खाते हों। उस व्यक्ति में लाख अच्छाइयां हों, पर वे हमें दिखाई नहीं देतीं। इसके उलट उन्हें हम उस व्यक्ति की कमजोरियों के तौर पर इंगित करते हैं। इसलिए कौन अच्छा है और कौन बुरा, यह हमारे न्याय-विवेक से नहीं, बल्कि स्वार्थों से निर्धारित होता है।

संजय वर्मा 

Wednesday, 4 March 2009

दुख और जीवन

दुख और निराशा प्राय: हरेक के जीवन में आते हैं। ऐसे में कई बार हालात से परेशान व्यक्ति को यह कहकर ढांढस बंधाया जाता है कि अंधेरी सुरंग के दूसरे छोर पर आशाओं की रोशनी होती है। यानी दुख का यह दौर बीतते ही सुख दिखाई पड़ेगा। हालांकि बहुत बार ऐसा होता है कि व्यक्ति की स्थितियों में कोई बदलाव नहीं होता।

अगर वह गरीब है, तो ताउम्र गरीब बना रहता है। अगर उसे कोई और कष्ट है, तो वह उस कष्ट से कभी निकल नहीं पाता है। पर उससे आशा भरी बातें कहने और उसे ढांढस बंधाने का असर यह होता है कि वह व्यक्ति धीरे-धीरे अपने कष्टों का अभ्यस्त हो जाता है। वह अपने दुखों से उबरता नहीं है, बल्कि उन दुखों के साथ रहना सीख जाता है।

लोगों को लग सकता है कि पहले जो व्यक्ति कष्टों में घिरे होने के कारण उदास रहा करता था, अब संभवत: दुखों से निजात पा चुका है, इसलिए प्रसन्न और सामान्य रहता है, जबकि असलियत में उसके कष्ट कायम रहते हैं, पर उनका आदी हो जाने की वजह से वह उनसे पहले की तरह पीडि़त नजर नहीं आता।

Tuesday, 3 March 2009

सेब गिरते हैं

कुछ लोग अक्सर दलील देते हैं कि प्रारब्ध हो, तो मनुष्य की नियति और जिंदगी एक ही दिन में बदल जाती है। मिसाल : एक दिन पेड़ से सेब गिरा और न्यूटन पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का रहस्य जान गया! महात्मा बुद्ध बोधि वृक्ष के नीचे बैठे और अचानक उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हो गई! भाग्य और नियति को स्थापित करने वाले ऐसे असंख्य उदाहरण हमारे आसपास बिखरे हो सकते हैं।

किसी व्यक्ति के जीवन में कोई एक दिन या एक लम्हा ऐसा हो सकता है, जहां से वह किसी और राह मुड़ जाता है। एकदम से दूसरे ट्रैक पर पहुंची जिंदगी की गाड़ी हो सकता है कि हमें बेहद अनूठे मुकाम पर ले जाए, पर तय है कि ऐसे सारे बदलाव अनायास नहीं होते। इसमें भाग्य नहीं होता, इसमें नियति की कोई भूमिका नहीं होती। बल्कि खुद के कर्मों का एक पूरा सिलसिला होता है, जो किसी एक दिन जाकर पूरा होता है और जिसके नतीजे में कोई बड़ी सफलता हासिल होती है या कोई बड़ा बदलाव जिंदगी में हो पाता है।

अब तक के कर्मों की जुड़ती कड़ी ही मनुष्य का उत्थान या पतन तय करती है। सेब जरूर रोज गिर सकते हैं, लेकिन उनके गिरने के सही कारण को पढ़ लेने की समझ विकसित होने में वर्षों या फिर सदियां तक लग सकती हैं।

संजय वर्मा 

दर्द है तो जिंदगी है

दुनिया में कुछ गिने-चुने लोग ऐसे भी हैं जिन्हें दर्द महसूस नहीं होता। किसी जेनेटिक खामी से पीड़ा की संवेदना उनके मस्तिष्क तक पहुंच ही नहीं पाती। छुटपन में दांत आने के बाद कुछ खाने की कोशिश में अक्सर वे अपनी जीभ काट लेते हैं। फिर चोटें धीरे-धीरे घातक होने लगती हैं। इंसान ही नहीं, कोई भी जीव अपनी तकलीफों के जरिए ही जानलेवा गलतियों से बचना सीखता है।

लेकिन पीड़ा की संपदा से वंचित ये लोग जीना नहीं सीख पाते और कम उम्र में ही संसार से विदा हो जाते हैं। दर्द अगर जीवन के लिए इतना ही जरूरी है तो फिर उससे इतनी नफरत हम क्यों करते हैं? नफरत तो उन चीजों, उन स्थितियों से की जानी चाहिए, जो हमें तकलीफ पहुंचाती हैं। ज्यादातर मामलों में उनके सामने हम लाचार होते हैं, लिहाजा अपनी सबसे जरूरी संवेदना से ही धीरे-धीरे नफरत करना सीख लेते हैं। दर्द के कारणों का निदान हर हाल में खोजा जाना चाहिए। लेकिन यह रास्ता अगर कभी बंद होता लगे तो दर्द के साथ आत्मिक संवाद बनाना भी हमें जरूर सीखना चाहिए।

चंद्रभूषण

Wednesday, 25 February 2009

अच्छाई का प्रचार

समाज में अच्छाई  का प्रचार निरंतर चलता रहता है। इसके लिए शिक्षा सबसे बड़ा माध्यम है। मनुष्य को शिक्षित करना दरअसल उसे बेहतर मनुष्य बना ने का प्रयत्न है। नियमित शिक्षण कार्य के अलावा कुछ लोग धार्मिक उपदेशों के जरिए समाज को अच्छाई का संदेश देते रहते हैं। फिर भी समाज से बुराई खत्म होने का नाम नहीं ले रही, जबकि बुराई का तो कोई प्रचार भी नहीं करता। कभी किसी अपराधी ने आज तक जुर्म के पक्ष में भाषण नहीं दिया।

हत्यारों ने बाकायदा संस्था बनाकर हत्या करने के तरीके नहीं सिखाए, बल्कि इसके विपरीत वे लोगों को अपराध से अलग रहने की सलाह देते हैं। इसका अर्थ यह है कि असभ्यता को सीखना नहीं पड़ता, वह तो स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर होती है। लेकिन हम प्रयत्न करके सभ्य बनते हैं, यानी अच्छाई हमें सीखनी पड़ती है।

हम शिक्षा और संस्कृति के हथियारों से अपनी स्वाभाविक वृत्ति को परास्त करने का प्रयत्न करते हैं। इसलिए अगर बुराई आज भी दिख रही है तो इसका मतलब यह है कि अच्छाई के प्रचार का काम कहीं न कहीं कमजोर पड़ रहा है।

जिंदगी और सामान

पहले मनुष्य का  जीवन बेहद सीमित था। उसके खान-पान के व्यंजन सीमित थे। अपने क्षेत्र में उपलब्ध सामग्री से वह अपना भोजन तैयार करता था। उस के मनोरंजन के साधन सीमित थे -खेल-कूद, गीत, नृत्य, बतरस, युद्ध कौशल और कलाओं का प्रदर्शन आदि। उसके काम की प्रकृति भी युद्ध, व्यापार, शिक्षा और कृषि तक सीमित थी।

धीरे-धीरे सभ्यता का विस्तार हुआ। लोग चांद तक जाने लगे। हवाओं में उड़ने का आनंद लेने लगे। टीवी और कंप्यूटर भी काम और मनोरंजन में शामिल हो गया। देश-विदेश के परिधान, गहने और व्यंजन उपलब्ध होने लगे। आसपास लिफ्ट, कार, प्लेन, पिजा, मसाज, कैसिनो, बार, डियो, आई-पॉड जैसी चीजों की तादाद जितनी बढ़ी, उनको भोगने की आदमी की आजादी उतनी घटती गई। पहले आदमी के पास जो कुछ भी था, उसे वह जी भर कर जी सकता था।

जीवन के हर पक्ष का जी भर कर सुख ले सकता था। अब उसके जीवन में अनगिनत चीजें आ गई हैं, पर उसके भोग का दायरा संकुचित हो गया है। आसपास चीजें बहुत सारी हैं, पर वह चंद चीजों के सहारे ही जीवन बिता रहा होता है। चीजों को भोगने की लालसा में जीवन को जीने का सुख उसके हाथ से फिसल गया है।

बामुसि

सामूहिकता के विरुद्ध

ऐसे कई लोग  हैं जो यह मानते हैं कि सामूहिकता की कमी ने समाज के सामने संकट पैदा कर दिया है। चूंकि, व्यक्ति अकेला हो गया है, इसलिए वह मूल्यों से कट गया है और कई बार गलत कदम उठा ले रहा है। यह भी कहा जाता है कि आजकल बच्चों में सामूहिकता की भावना लुप्त होती जा रही है, इसलिए वे स्वार्थी होते जा रहे हैं। ये सारी बातें अपनी जगह सही हैं, लेकिन सामूहिकता के दूसरे पहलुओं पर विचार करना भी जरूरी है।

समाज में व्यक्तिवाद यूं ही नहीं आ गया है। दुनिया में इसके पक्ष में बड़े-बड़े आंदोलन हुए और उसे प्रतिष्ठा मिली। सामूहिकता कई बार मनुष्य को वैचारिक रूप से परतंत्र बना देती है। आदमी समूह का दास बन जाता है और समूह के मूल्यों को ही अंतिम मान लेता है। वह मौलिक चिंतन करने की जरूरत ही नहीं महसूस करता। लेकिन जिन लोगों ने समूह के दबाव को नकारकर अपना रास्ता खुद ढूंढा, वे समाज के लिए ज्यादा उपयोगी साबित हुए। कई समूहों ने ही जातिवाद या इस जैसी दूसरी कुप्रथाओं को पाल-पोसकर रखा, लेकिन इन कुरीतियों को चुनौती देने की शुरुआत समूह से टकराकर ही हुई।

Tuesday, 24 February 2009

अनिश्चितता के बीच

योजना बनाना मनुष्य के स्वभाव का अंग है। हर व्यक्ति अपने जीवन के बारे में तरह-तरह की योजनाएं बनाता है। प्राय: हर सचेत व्यक्ति अपने रोजमर्रा जीवन की आवश्यकताओं पर होने वाले खर्च का हिसाब-किताब रखता है।

यह व्यक्ति द्वारा खुद को एक निश्चित व्यवस्था में रखने और अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने की एक कोशिश है। हालांकि हमारे तमाम प्रयत्नों के बावजूद हमारी योजनाएं शत-प्रतिशत सफल नहीं हो पातीं। अक्सर हम अपनी इच्छाओं से परास्त होते हैं या कुछ ऐसी अप्रत्याशित स्थितियां आ जाती हैं कि हमारा हिसाब-किताब गड़बड़ा जाता है लेकिन इसे मनुष्य की असफलता मानना ठीक नहीं होगा।

हमारी किसी योजना का लड़खड़ाना इस बात का सबूत है कि हम मनुष्य हैं, मशीन नहीं और जीवन में सब कुछ तयशुदा तरीके से घटित नहीं होता। जीवन की अनिश्चितता ही शायद उसे रोचक बनाती है। इसी अनिश्चितता और हमारी योजनाओं में एक रस्साकशी चलती रहती है। इसमें हमारी जीत महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है अनिश्चितता में भी एक व्यवस्था बनाने का प्रयत्न। बजट चाहे व्यक्ति का हो या राष्ट्र का, वह इन्हीं प्रयत्नों की एक कड़ी है।

संजय कुंदन

निजी बनाम सार्वजनिक जीवन

हम कुछ चीजों को अपना व्यक्तिगत मामला बताते हैं लेकिन सच कहा जाए तो हमारे कई निजी प्रसंगों का गहरा सामाजिक संदर्भ होता है। हमारा कोई भी मनोभाव समाज से या सार्वजनिक जीवन से निरपेक्ष नहीं है। 

अगर कोई समाज को नकारना चाहता है, तो उसके भीतर उपजे नकार के भाव के लिए भी सामाजिक परिस्थितियां ही किसी न किसी रूप में जिम्मेदार होती हैं। ऐसे लोग बहुत हैं, जिनका निजी कष्ट एक व्यापक सार्वजनिक पीड़ा के रूप में व्यक्त होता है। जैसे कोई व्यक्ति प्रेम में असफल होने के बाद अचानक देश और समाज के लिए चिंता व्यक्त करने लगता है। संभव है प्रेम हासिल होने के बाद उसकी यह चिंता समाप्त हो जाए। लेकिन इसका उलटा भी संभव है। ऐसे भी लोग हैं जो अपनी निजी चिंताओं से ऊपर उठ जाते हैं। वे दूसरों के दुखों को अपना समझते हैं और उन्हें दूर करने के लिए उसी तरह तत्पर हो जाते हैं जिस तरह वे अपने कष्टों से लड़ते हैं। ऐसे लोग कम होते हैं, लेकिन इन्हीं के बीच से समाजसुधारक या राष्ट्रसेवी पैदा होते हैं।

संजय कुंदन

दुख का महत्व

कोई नहीं चाहता कि उसके जीवन में दुख-तकलीफ आए। हम दुख को नकारते जरूर हैं पर उसे अपने जीवन से बाहर नहीं कर
ते। प्राय: उसे संजो कर रखते हैं। जब हमारे सामने कोई अपने किसी कष्ट की चर्चा शुरू करता है तो हम भी अपने किसी पुराने दुख पर बात करने लगते हैं।

अगर हम दुख पर चर्चा करते दो लोगों को देखें तो लगेगा कि दोनों में अपने कष्ट को बड़ा बताने की होड़ सी लगी हुई है। हर व्यक्ति अपने कष्ट को सबसे बड़ा मानता है क्योंकि उसकी अनुभूति से वह सीधा जुड़ा होता है। अगर मनुष्य को अपने दुखों से प्यार नहीं होता तो साहित्य में ट्रैजिडी की अवधारणा ही सामने नहीं आती, केवल सुखांत साहित्य रचा जाता।

असल में दुख एक कसौटी है। दुख की चर्चा के पीछे यह भाव रहता है कि देखो मैं इतनी तकलीफों को पार कर यहां तक पहुंचा हूं, मैं इतने कष्टों के बीच भी अविचल रहा हूं। दुख के माध्यम से हम स्वयं को प्रमाणित करते हैं। दुख एक ध्वज है जिसे लहराकर हम अपनी सफलता की घोषणा करते हैं।

संजय कुंदन 

देखना - अनदेखना

जब कोई व्यक्ति हमारे  पास से चला जाता है, तब अचानक हमें उसके बहुत सारे गुण याद आने लगते हैं। जब किसी का निधन हो जाता है, तब हम उसके सद्गुणों को याद करते हैं। जब कोई वस्तु छिन जाती है, तो हम सोचते हैं कि उसकी वजह से हमें क्या -क्या सुविधाएँ प्राप्त होती थीं। अजीब बात है कि जब वह चीज हमारे पास होती है, जब तक वह व्यक्ति हमारे साथ होता है, हम उसके गुणों को इतने निश्छल मन से नहीं स्वीकार करते।

शायद हमारे भीतर एक अज्ञात भय बसा होता है कि उसके गुणों का बखान करने से हमारी महानता बौनी हो जाएगी। शायद यह आशंका रहती है कि वह गुणी व्यक्ति अचानक कोई ऐसा काम कर देगा जिससे हमारा अहित हो जाएगा। जिस दिन ऐसी आशंकाओं से मुक्त हो कर हम अपने साथ चलने वालों के गुणों को सराहना सीख जाएँगे, उसी दिन हमारी यह दुनिया बदल जाएगी। गुण- अवगुण तो सब में हैं, उसे देखना -अनदेखना हम अपने स्वार्थ के अनुसार करते हैं।

बामुसि

मैं हूं अपना नायक

अनुकरण हमारे स्वभाव  का हिस्सा है। मनुष्य हमेशा दूसरों से कुछ न कुछ सीखने की चेष्टा करता है। कई बार वह दूसरों से अच्छी चीजें ग्रहण करता है तो कई बार बुरी चीजें भी। एक व्यक्ति कोई भी नया काम शुरू करने से पहले एक मानक तय करता है।

यह मानक वह प्राय: अपने आसपास के ही किसी इंसान को बनाता है और ठीक उसी के जैसा प्रयत्न शुरू कर देता है। लेकिन कई बार वह गलत नायक चुन लेता है और अपनी स्वाभाविक वृत्ति से भटक जाता है। संभव है कि हमारे किसी नायक से बेहतर मानक हमारा स्वयं अपना ही जीवन हो। इसलिए हमेशा बाहर देखने की आदत को छोड़कर अपने भीतर भी देखना चाहिए।

संघर्ष का अपना ही कोई पुराना अध्याय हमें कि सी नए मोड़ पर कहीं ज्यादा संबल प्रदान कर सकता है। तो क्यों न हम अपने आप को ही अपना नायक मानें और अपने एक प्राप्त लक्ष्य को प्रस्थान बिंदु बनाकर नए लक्ष्य का संधान करें। दूसरों से सीखना हमेशा महत्वपूर्ण है पर खुद को दूसरों की जगह पर रखकर सीखना भी एक रोचक अनुभव हो सकता है।

संजय कुंदन  

बड़ा अभियान


अतीत में ऐसी कई  मिसालें मिलती हैं कि कैसे बड़े अभियानों से देश और समाज में व्यापक परिवर्तन आए। कुरीतियों का खात्मा हुआ और कई सामाजिक
सुधार हुए। इस आधार पर कहा जाता है कि बड़े अभियान चलाए बिना कुछ हासिल नहीं होता।

आज के नौजवान भी अक्सर यह दुहाई देते हैं कि जिंदगी में कुछ बड़ा किया जाए, तो ही जीवन की सार्थकता है। बड़ी पूंजी लगाई जाए, बड़े कारखाने खोले जाएं। पर क्या बड़े अभियान और बड़ी योजना के बिना जिंदगी में वास्तव में कुछ भी कायदे का नहीं हो सकता? अक्सर होता यह है कि बड़ी योजनाओं का सपना देखते-देखते पूरी उम्र बीत जाती है। जिस तरह कोई बड़ी इमारत छोटी-छोटी ईंटों को लगाए बिना नहीं बन सकती, कोई लंबी रस्सी छोटे-छोटे रेशों को एक साथ बंटने से नहीं पूरी हो सकती, उसी तरह कोई बड़ी योजना छोटे-छोटे प्रयासों के बिना मुकम्मल नहीं हो सकती। छोटी जलधाराएं नहीं होतीं, तो बड़ी नदी भला किस तरह बनती? छोटी-बड़ी हर तरह की नदियां नहीं होतीं, तो क्या महासागरों को भरा जा सकता था? बड़े अभियानों का आरंभ एक छोटी कोशिश है, उसकी सार्थकता यही है कि उसके बिना कोई योजना बड़ी बन ही नहीं सकती।

संजय वर्मा  

जिंदगी है ट्रेन

जिंदगी एक ट्रेन की तरह  है। इसकी शुरुआत एक स्टेशन से होती है और आखिरी स्टेशन तक पहुंचने से पहले उसे छोटे-बड़े स्टेशनों की तरह कई तरह के
पड़ावों से गुजरना पड़ता है, रास्ते में कई पटरियां बदलनी होती हैं।

हालांकि हरेक की कामना होती है कि राजधानी या शताब्दी की तरह पहले और आखिरी स्टेशन के बीच जिंदगी की उसकी गाड़ी सुख के फर्राटे भरती रहे, छोटे या बड़े कैसे भी दुख के स्टेशनों पर हरगिज न रुके, पर जाहिर है, ऐसा होता नहीं है। आपकी ट्रेन भले ही एक्सप्रेस गाड़ी हो, गंतव्य से पहले उसके रुकने का कायदा न हो, तो भी अक्सर बीच में कहीं न कहीं उसे रुकना ही पड़ जाता है। कोई न कोई बाधा उसके रास्ते में आ ही जाती है। अफसोस न करें, अगर वह कोई बेहद छोटा सा, निराश करने वाला, बुझा-बुझा सा दिखने वाला स्टेशन हो। सवाल है कि क्या छोटे स्टेशनों को बिना पार किए बड़े या आखिरी स्टेशन तक पहुंचा जा सकता था? अगर यह तय है कि हमारे रास्ते में कई छोटे स्टेशन हैं, तो उन पर ठहरकर उनका भी मजा क्यों न लिया जाए। क्या पता वे छोटे स्टेशन बड़े स्टेशनों के मुकाबले कुछ ज्यादा रोशनी दिखा जाएं।

संजय वर्मा  

जो अपरिभाषित है

यह जरूरी नहीं कि जीवन की हर वस्तु या प्रसंग के दो पहलू हों -रात और दिन की तरह। जीवन का इतना सरल विभाजन कई स्तरों पर तो है, लेकिन हर जगह
इसे ढूंढना गलत होगा। हमने अपनी सुविधा के लिए दो पहलू जरूर बना लिए हैं, पर चीजें उन्हीं में सिमटी नहीं। ऐसा नहीं है कि जीवन में या तो सुख है या फिर दुख, सच है या फिर झूठ।

असल में सुख और दुख के बीच की भी एक अवस्था है। इसी तरह सच और झूठ के बीच भी कोई स्थिति है। इनके बीच एक रेखा है जो स्थान, समय और व्यक्ति की समझ और सोच के मुताबिक धुंधली तथा गहरी होती रहती है। इसी तरह निर्णय और अनिर्णय के बीच की भी एक दशा होती है, जिसमें अधिकतर लोग फंसे रहते हैं। 'बिटविन द लाइंस' की अवधारणा इसी के कारण पैदा हुई है। यानी अर्थ और अनर्थ के बीच तथा कहे और अनकहे के बीच अभी बहुत कुछ है, जिनका सामने आना बाकी है। संभव है, प्रकट और अप्रकट के बीच की किसी अवधारणा में हमें भावी जीवन के कई अहम सूत्र मिल जाएं। हो सकता है अब तक जो अपरिभाषित है, उसी में हमें अपने समय की कोई परिभाषा मिल जाए।

संजय कुंदन