दोस्ती की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। आज तक मनोवैज्ञानिक भी इस बारे में किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सके हैं। एक विचार यह है कि दोस्ती आत्मा के स्तर पर होती है। बच्चों में बड़ी जल्दी दोस्ती हो जाती है क्योंकि वे निश्छल होते हैं, लेकिन बड़ों में समझदारी आ जाती है, इसलिए उनकी दोस्ती भी नकली होती है। आमतौर पर यह समझा जाता है कि एक जैसी रुचि रखने वाले या एक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में स्वाभाविक रूप से दोस्ती हो जाती है। पर इसे मित्रता कहना ठीक नहीं होगा। यह साहचर्य से उपजा संबंध है जिसमें वह निश्छलता या एक-दूसरे के लिए मर मिटने का भाव नहीं होता। बल्कि कई बार उलटा होता है। एक क्षेत्र के लोग साथ रहते हुए भी प्रतिद्वंद्विता की भावना से ग्रस्त रहते हैं। साथ रहते हुए भी वे एक-दूसरे को पीछे छोड़कर आगे निकल जाने की चाह रखते हैं। ऐसे में वह गर्मजोशी कैसे आ सकती है, जो सच्ची दोस्ती में जरूरी मानी जाती है। इसलिए अलग-अलग क्षेत्र के लोगों की दोस्ती में अधिक ऊष्मा होती है। इसलिए ज्यादा संभावना इस बात की है कि एक राजनेता का सबसे अच्छा दोस्त कोई लेखक हो या कोई डॉक्टर किसी इंजीनियर को सबसे करीबी मानता हो ।
Tuesday, 25 March 2008
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