हमारे भीतर रोज अनेक इच्छाएं आकार लेती हैं और हम उन्हें स्थगित करते चलते हैं, न जाने किन दिनों के लिए। हम अपने को दिलासा देने के लिए एक समय तय कर लेते हैं कि अमुक वर्ष में अपनी किसी इच्छा के साथ जीएंगे। पर अमूमन ऐसा होता नहीं है। वह इच्छा फिर स्थगित हो जाती है किसी और काल के लिए।
अगर स्थगित इच्छाओं की सूची बनाई जाए तो पता चलेगा कि हमारे जीवन में बस एक-दो इच्छाएं ही साथ चल रही हैं, बाकी सब कुछ स्थगित है यानी एक व्यक्ति वह सब कुछ नहीं कर पा रहा है जो करना चाहता है। लेकिन टाल दी गई इच्छाएं हमारे जीवन से विदा नहीं होतीं। ऐसा नहीं है कि वह हमसे अलग कोई बसेरा बना लेती हैं। वह हमारे मन के किसी कोने में ही कुलबुलाती रहती हैं। हर आदमी रोजमर्रा के संघर्ष को झेलने के लिए अपने मन के कई सुंदर कोनों में आवाजाही करता रहता है। एक स्वप्नलोक हमेशा हमारे साथ चलता है। वह तनावों की तपिश में थोड़ी राहत देता है। यह स्वप्नलोक इन्हीं स्थगित इच्छाओं से बनता है।
Tuesday, 25 March 2008
स्थगित इच्छाए
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संजय कुंदन
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