हरेक इंसान अपने भीतर व्यवहार का एक मानक बनाए रखता है। यह मानक खुद उसके अनुभवों की देन हो सकता है। कई बार वह अपने आसपास के समाज को देखकर भी ऐसे मानक बना लेता है। लेकिन वह कभी इन मानकों पर खुद को नहीं आंकता। इसकी बजाय वह उन मानकों को अपने विरोधियों पर लागू करता है। इस तरह वह जीवन भर खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को कमतर साबित करने की चेष्टा करता है। पर अपने ऐसे प्रयास में वह कुछ दूसरी गलतियां कर बैठता है।
विरोधियों के कार्य, जीवन और शैली में कमियां निकालने के उद्देश्य से जब वह उनका बहुत करीब पहुंचता है, तो अक्सर वह खुद भी अपने विरोधियों जैसा हो जाता है। हालांकि खुद उसे यह बात महसूस नहीं होती, पर वह वे सारे आचरण अपने व्यवहार में उतार चुका होता है, जिनके वह खिलाफ रहा होता है। दूसरों का विरोध करने की जगह अगर व्यक्ति खुद का विरोध कर सके, तो वह श्रेष्ठ इंसान बन सकता है।
संजय वर्मा
Monday, 3 August 2009
विरोधी की तरह
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