Wednesday, 26 August 2009

अबूझ गति

जिस समय हम सोचते हैं कि सफलता की ऊंचाइयां हासिल करने जा रहे हैं, उसी वक्त कोई गहरी खाई तैयार हो रही हो ती है, जिसमें हम गिरने वाले हैं। जिस समय हम खुद को असहाय और डूबता हुआ समझ लेते हैं, उसी वक्त कोई तेज हहराती हुई लहर उठ रही होती है, जो हमें उछाल कर किनारे फेंक देने वाली है। मेंढक किसी पतंगे का निशाना साधते समय यह नहीं जानता कि उसके पीछे घात लगाए सांप सरक रहा है। और सांप नहीं जानता कि अचानक किस झाड़ी से निकल कर नेवला उसे दबोचने वाला है।

यह काल की अबूझ गति नहीं है। यह भाग्यवाद नहीं है। यह हमारी आंखों की, हमारी सूझ-बूझ और सतर्कता की सीमा है, जिसके आगे हम नहीं देख पाते। हम अपनी सफलता या असफलता के उस एक क्षण को अंतिम सत्य मान लेते हैं, जो कि सच नहीं होता। इसलिए उससे अलग कोई भी स्थिति हमें विस्मय से भर देती है।

3 comments:

श्यामल सुमन said...

है रहस्य जीवन का हर पल कहा आपने ठीक।
साँप पतंगे और मेढ़क का दर्शन लगा सटीक।।

संगीता पुरी said...

कमाल की बातें करते हैं आप !!

Udan Tashtari said...

आलेख अच्छा लगा!