Thursday, 23 July 2009

छिपाने की कला

जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ता गया है, व्यक्तित्व के भी नए-नए मानदंड विकसित हुए हैं या कहें कि सांचे तैयार हो गए हैं। हर आदमी इस कोशिश में रहता है कि वह किसी सांचे में फिट हो जाए। इसके लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। लेकिन दूसरी तरफ उनके मन में तरह-तरह के स्वप्न आकार लेते रहते हैं, भाव उमड़ते रहते हैं। विचित्र-विचित्र आकांक्षाएं पैदा होती रहती हैं। लेकिन इस बारे में कोई कम ही बात करता है क्योंकि ये बातें किसी सांचे के अनुकूल नहीं होतीं बल्कि प्रतिकूल ही होती हैं। इसलिए आजकल मन की बातें बताने का चलन खत्म हो गया है।

लोग उन्हें अपने भीतर ही सीमित रखना चाहते हैं। उन्हें छिपाते हैं। हम जो भी बातें करते हैं, उनमें इस बात का खासतौर से ध्यान रखते हैं कि अपने भीतर की वे सहज, अनगढ़ इच्छाएं कहीं झलक न जाएं। यानी हम छिपाते ज्यादा हैं। जो हमारा सहज और स्वाभाविक है, उसे छिपा लेना एक कला का रूप लेता जा रहा है।

संजय कुंदन

1 comments:

ओम आर्य said...

pahali baar padhi maine itani sachchhee post jisame suksham nirichhan hai .......bilkul satya