ऊपरी तौर पर समस्त प्रकृति में हर चल-अचल चीज की एक निश्चित भूमिका और एक निश्चित काम दिखाई देता है। इस आधार पर मान लिया जाता है कि बादलों का काम सिर्फ वर्षा करना या पेड़ों का सिर्फ छाया देना है। पर भूमिकाओं का निर्धारण करने वाला ऐसा आकलन अक्सर अधूरा होता है। पेड़ जिस जगह खड़ा है, वहां वह सिर्फ छाया नहीं करता, वहां की जमीन को उपजाऊ भी बनाता है, वहां की आबोहवा में अपने फूल-पत्तों से सुगंध और नरमाई भी घोलता है।
इसी तरह शरीर के अलग-अलग अंगों को ही लें। कान सिर्फ सुनता ही नहीं, क्या सुनना है क्या छोड़ना है- इस तरह का संपादन भी करता है। हाथ सिर्फ वजन नहीं उठाते, लेखन और कई कलात्मक कार्य करने के अलावा स्पर्श के माध्यम से दूसरे के अस्तित्व का अहसास भी हमें कराते हैं।
किसी चीज के बारे में अगर यह मान लिया गया है कि जितनी और जैसी भूमिका उसकी तय की गई है, वह उसी दायरे में रहेगा, तो यह हमारी भूल है। अक्सर ऐसे आकलन बड़ा झूठ साबित होते हैं और यह नतीजा हमारे सामने आता है कि जिसकी जो हैसियत, खूबी या कमी बताई जाती रही है, वह असल में उससे अलग है और निर्धारित की गई क्षमता से ज्यादा ताकत उसमें है।
संजय वर्मा
Thursday, 21 May 2009
आकलन से ज्यादा
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2 comments:
बहुत बढिया ..
bilkul sahi akalan hai badhai
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