कई बार कुछ महानगरों को लेकर चिंता व्यक्त की जाती है कि अगर वहां बाहर से लोगों के आने का सिलसिला जारी रहा तो न जाने क्या होगा। दुनिया में ऐसे उदाहरण शायद ही मिलेंगे कि कभी किसी शहर के विकास की संभावना अचानक खत्म हो गई हो। हां, प्राकृतिक आपदाओं ने शहरों को जरूर चौपट किया लेकिन लोगों की बढ़ती संख्या के कारण शायद ही किसी शहर ने दम तोड़ा हो।
बल्कि उलटा ही हुआ है। उन शहरों ने ज्यादा विकास किया जहां हमेशा यह सवाल बना रहा कि अब अगर इसकी जनसंख्या और बढ़ी तो न जाने क्या होगा। लोगों की बढ़ती भीड़ ने जहां समस्या पैदा की, वहीं नई तकनीक और रहन-सहन के नए तौर-तरीके अपनाने को भी प्रेरित किया। नई जरूरतों ने ही फ्लाईओवर और मेट्रो हमें दिए।
असल में किसी शहर को भूगोल के बने-बनाए ढांचे में ही सीमित रखने की प्रवृत्ति के कारण इस तरह के सवाल उठते हैं। अगर हमारे जेहन में भूगोल की रेखाएं शिथिल पड़ जाएं और हम शहरों को उसके नाम के चौखटे से आजाद कर दें तो शायद कोई विवाद ही न रहे। आखिर मानव सभ्यता मनुष्य की जरूरतों और उसकी सहूलियत के हिसाब से ही बसती रही है और उसका ताना-बाना बदलता रहा है।
संजय कुंदन
Friday, 10 April 2009
खत्म नहीं होते शहर
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