Thursday, 23 April 2009

जो व्यावहारिक नहीं

हम मानते हैं कि कुछ चीजें व्यावहारिक हैं और कुछ अव्यावहारिक। इस विभाजन ने हमारे लिए बड़ी सुविधा पैदा कर दी है। जिस चीज को हम अपने अनुकूल नहीं पाते या जिस काम को करने में हमें कठिनाई होती है, उसे हम अव्यावहारिक कहकर उससे मुक्त हो लेते हैं। विचारों के साथ भी समाज ने यही सलूक किया है।

समाज ने उन्हें अव्यावहारिक बताकर उनके लिए एक पवित्र कोना निश्चित कर दिया है। उन लोगों को भी अव्यावहारिक बता दिया जाता है जो बदलाव या मूल्यों की बात करते हैं। व्यावहारिकता की अवधारणा दरअसल ताकत की अभिव्यक्ति है। हर दौर में प्रभावशाली लोगों ने अपने विचार और कृत्यों को व्यावहारिक घोषित किया और बाकी सब को अव्यावहारिक के खाते में डाल दिया।

इन ताकतवर लोगों के लिए कुल मिलाकर व्यावहारिकता का मतलब रहा-यथास्थितिवाद। लेकिन हर दौर में ऐसे 'अव्यावहारिक' लोग सामने आए जिन्होंने कथित व्यावहारिकता को चुनौती दी। उनकी कोशिशों से ही समाज में विकास के नए रास्ते खुले। अगर वे भी व्यावहारिक बनने के चक्कर में पड़ते तो समाज कभी आगे नहीं बढ़ता। इसलिए जो कुछ भी अव्यावहारिक बताया जा रहा है, उस पर ध्यान देने की जरूरत है। भविष्य की संभावनाएं उसी में छिपी हैं।

संजय कुंदन

1 comments:

Anil Kumar said...

आपकी पोस्ट में कूटार्थ भरे पड़े हैं, लेकिन कुल मिलाकर सही कह रहे हैं। "चलता है" प्रवृत्ति से हटने वाले ही महापुरुष बन पाते हैं। धन्यवाद!