हम भविष्य के लिए अपनी तैयारियों को देखें तो पता चलेगा कि इसमें भय की बड़ी भूमिका है। हम पैसे बचाते हैं यह सोचकर कि कहीं अचानक कोई संकट आ गया तो! हम किसी मुश्किल में न पड़ें इसके लिए साधन जुटाते हैं। आम तौर पर हम यह नहीं सोचते कि संचित किए गए धन या साधन का कोई सार्थक इस्तेमाल करेंगे या अपने मन में दबी किसी योजना को मूर्त रूप देने के लिए इसका प्रयोग करेंगे या इससे और ज्यादा सुख हासिल करेंगे।
प्राय: लोग यह कहते हैं कि वे अपने बच्चों के लिए अर्जित कर रहे हैं। इसके पीछे भी वही भय है। उन्हें यह आशंका सताती रहती है कि अगर बच्चे अपने लिए कुछ हासिल न कर सके, तो क्या होगा। जाहिर है हमारी नकारात्मक सोच ही हमसे संचय करवाती है। अगर हमें भविष्य का भय न हो और अगर हम यह मानकर चलें कि कल सब कुछ बेहतर होने वाला है तो शायद हम संचय पर ध्यान ही न दें। हो सकता है इंसान की भागदौड़ तब कम हो जाए।
संजय कुंदन
Monday, 11 May 2009
भविष्य का भय
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