हमें लगता है कि हम जिन चीजों के करीब रहते हैं, उनके बारे में सब कुछ जानते हैं। सचाई इसके विपरीत है। अकसर हम उन्हीं चीजों को नहीं जानते जिनसे हमारा रोज सामना होता है, जिन्हें हम रोज देखते हैं। जैसे यह संभव है कि कोई व्यक्ति उस सड़क के किनारे या आसपास की चीजों को कभी न देखे, जिससे होकर वह रोज दफ्तर जाया करता है।
हालांकि उन चीजों पर हमेशा उसकी नजर होती है लेकिन वह दिमाग से कहीं और होता है। वह समय पर दफ्तर पहुंचने के तनाव में होता है। वह यह सोच रहा होता है कि उसे कौन से काम निपटाने हैं, क्या-क्या करना है। इसी तरह शाम में घर लौटते हुए भी वह घर पहुंचने की जल्दी में होता है या किन्हीं और जरूरी चीजों में उलझा होता है। इस दौरान वह एक पेड़ को देखकर भी दरअसल उसे नहीं देख रहा होता है। रोज-रोज उसकी नजर अपने दफ्तर के ठीक बगल वाली दुकान पर पड़ती है लेकिन अगर उससे पूछा जाए कि उसके ऑफिस के ठीक बगल में क्या है, तो मुमकिन है वह न बता सके।
संजय कुंदन
Monday, 11 May 2009
हमारी अज्ञानता
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