अक्सर यह बात कही जाती है कि आदमी होड़ में न पड़े। होड़ मनुष्य को गहरे तनाव में डाल देता है, असहज बना देता है। लेकिन क्या मनुष्य किसी भी होड़ से अपने को अलग कर पाता है?
मनुष्य अगर अपने को होड़ से अलग भी कर ले तो वह चैन से नहीं बैठ पाता। हो सकता है तब उसे अपना जीवन शिथिल और निरुद्देश्य लगने लगे। ऐसे लोग कम होते हैं जो अपनी हर तरह की इच्छा से निरपेक्ष होकर परम संतुष्ट जीवन जी सकें। हम ज्यों ही कोई कामना करते हैं, किसी न किसी प्रतियोगिता में उतर जाते हैं। अगर कोई खुद के लिए कुछ नहीं चाहता तो अपनी संतान के लिए इच्छा करता है। संतान को बेहतर जीवन देने की चाह में वह दूसरे की संतानों से उनकी तुलना करने लगता है और उन्हें अच्छे से अच्छा बनाने की होड़ में फिर उतर आता है। जीवन है, तो प्रतियोगिता है। इनसे घबराने से अच्छा है इन्हें स्वीकार किया जाए लेकिन अपनी इस वृत्ति पर नियंत्रण भी रखा जाए।
संजय कुंदन
Monday, 11 May 2009
प्रतियोगिता से मुक्ति नहीं
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