रोटी, कपड़ा और मकान को इंसान की बुनियादी जरूरत समझा जाता रहा है। अमर्त्य सेन ने इस सूची को थोड़ा और बढ़ाया। उन्होंने शिक्षा को इसमें शामिल किया, साथ में उन सभी चीजों को, जिनके बगैर इंसान अपने दायरे में अलग-थलग पड़ जाता है। कंकड़ों से पांव को सुरक्षित रखने का काम हवाई चप्पल से भी चल जाता है लेकिन अगर किसी के दायरे में आने वाले सारे लोग जूते या चमड़े की चप्पलें पहनते हों तो हवाई चप्पल उसकी जरूरत पूरी नहीं कर पाती।
पड़ोस के हर घर में कलर टीवी आ जाने के बाद अच्छे-खासे ब्लैक ऐंड व्हाइट टीवी को भी कबाड़ में जाना पड़ता है और घर-घर में कार होने का दबाव एक दिन इसे भी बुनियादी जरूरतों की सूची में शामिल करा देता है। अगर कोई इस बात को लेकर बहुत सचेत हो कि वह अपने जीवन-व्यापार में दिखावे या विलासिता के लिए कोई जगह नहीं छोड़ेगा, तो भी जरूरतों के जाल में वह उलझता ही चला जाता है- हालांकि रोटी, कपड़ा और मकान से वंचित लाखों लोग तब भी उससे कुछ ही दूरी पर रह रहे होते हैं।
चंद्रभूषण
Tuesday, 7 April 2009
जरूरत और दिखावा
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1 comments:
बहुत बढिया कहा ...
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