लोगों के बारे में कामचलाऊ राय बनाने के लिए अक्सर हम धारणाओं का सहारा लेते हैं। जज यानी न्याय में आस्था रखने वाला ईमानदार आदमी, फौजी यानी देश के लिए मर-मिटने वाला शेरदिल इंसान, कलाकार यानी कल्पना में खोया रहने वाला, वैज्ञानिक यानी चीजों की बारीकियां तलाशने वाला गैर-दुनियादार इंसान...वगैरह। ये धारणाएं हम कुछ पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर बनाते हैं और अक्सर इनके आधार पर ही लोगों से व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। अतीत में ऐसी धारणाएं जातियों के आधार पर बनाई जाती थीं। जैसे ब्राह्मण यानी विद्वान, क्षत्रिय यानी पराक्रमी...आदि। जब भी ये धारणाएं टूटती थीं तब मूर्ख ब्राह्मण कथा जैसी कहानियां बन जाया करती थीं। इनसे पिछला स्टीरियोटाइप टूटता नहीं था, सिर्फ एक और स्टीरियोटाइप उसके साथ नत्थी हो जाता था। आज वैसा नहीं है। एक घूसखोर जज का मामला सामने आते ही लोग पूरी न्यायपालिका को शक की नजर से देखने लगते हैं और एक वैज्ञानिक को चंद्रग्रहण के वक्त नहाते देख सारे वैज्ञानिकों को पोंगा समझ लिया जाता है। लोगों को धारणाओं से बाहर इंसान की तरह देखना हम कब सीखेंगे?
चंद्रभूषण
Tuesday, 31 March 2009
धारणाओं के पार
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2 comments:
हम सब पूर्वाग्रहों के गुलाम हो गए हैं। यदि कोई वैज्ञानिक साहित्य में रुचि लेता है तो उसे कहेंगे कि विज्ञान और साहित्य का क्या मेल? हम उसके प्रोफेशन और रुचियों को संयुक्त करके देखते हैं। बहुत सटीक विषय, बधाई।
अचानक से अखबार का कतरन पढ़ कर आश्चर्य हुआ। मुझे लगा लेखक खुद अपने ब्लाग पर इसे डाला है। पर यह तो कल का कतरन था।
जो भी हो, बातें आपने बिल्कुल सही फरमाई है। हम सब पहले ऐसा ही सोचते थे। पर अब माहोल बदल रहा है। लोग अपने व्यवसाय से ज्यादा ध्यान अपने नीजि जीवन पर भी देने लगे हैं।
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