Tuesday, 24 February 2009

देखना - अनदेखना

जब कोई व्यक्ति हमारे  पास से चला जाता है, तब अचानक हमें उसके बहुत सारे गुण याद आने लगते हैं। जब किसी का निधन हो जाता है, तब हम उसके सद्गुणों को याद करते हैं। जब कोई वस्तु छिन जाती है, तो हम सोचते हैं कि उसकी वजह से हमें क्या -क्या सुविधाएँ प्राप्त होती थीं। अजीब बात है कि जब वह चीज हमारे पास होती है, जब तक वह व्यक्ति हमारे साथ होता है, हम उसके गुणों को इतने निश्छल मन से नहीं स्वीकार करते।

शायद हमारे भीतर एक अज्ञात भय बसा होता है कि उसके गुणों का बखान करने से हमारी महानता बौनी हो जाएगी। शायद यह आशंका रहती है कि वह गुणी व्यक्ति अचानक कोई ऐसा काम कर देगा जिससे हमारा अहित हो जाएगा। जिस दिन ऐसी आशंकाओं से मुक्त हो कर हम अपने साथ चलने वालों के गुणों को सराहना सीख जाएँगे, उसी दिन हमारी यह दुनिया बदल जाएगी। गुण- अवगुण तो सब में हैं, उसे देखना -अनदेखना हम अपने स्वार्थ के अनुसार करते हैं।

बामुसि

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