जिंदगी एक ट्रेन की तरह है। इसकी शुरुआत एक स्टेशन से होती है और आखिरी स्टेशन तक पहुंचने से पहले उसे छोटे-बड़े स्टेशनों की तरह कई तरह के
पड़ावों से गुजरना पड़ता है, रास्ते में कई पटरियां बदलनी होती हैं।
हालांकि हरेक की कामना होती है कि राजधानी या शताब्दी की तरह पहले और आखिरी स्टेशन के बीच जिंदगी की उसकी गाड़ी सुख के फर्राटे भरती रहे, छोटे या बड़े कैसे भी दुख के स्टेशनों पर हरगिज न रुके, पर जाहिर है, ऐसा होता नहीं है। आपकी ट्रेन भले ही एक्सप्रेस गाड़ी हो, गंतव्य से पहले उसके रुकने का कायदा न हो, तो भी अक्सर बीच में कहीं न कहीं उसे रुकना ही पड़ जाता है। कोई न कोई बाधा उसके रास्ते में आ ही जाती है। अफसोस न करें, अगर वह कोई बेहद छोटा सा, निराश करने वाला, बुझा-बुझा सा दिखने वाला स्टेशन हो। सवाल है कि क्या छोटे स्टेशनों को बिना पार किए बड़े या आखिरी स्टेशन तक पहुंचा जा सकता था? अगर यह तय है कि हमारे रास्ते में कई छोटे स्टेशन हैं, तो उन पर ठहरकर उनका भी मजा क्यों न लिया जाए। क्या पता वे छोटे स्टेशन बड़े स्टेशनों के मुकाबले कुछ ज्यादा रोशनी दिखा जाएं।
संजय वर्मा
Tuesday, 24 February 2009
जिंदगी है ट्रेन
Labels:
Amarjeet Singh,
hotamar,
NavBharat Times,
Ulatvasi,
उलटवांसी,
नवभारत टाइम्स,
संजय वर्मा
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

0 comments:
Post a Comment