ऐसे कई लोग हैं जो यह मानते हैं कि सामूहिकता की कमी ने समाज के सामने संकट पैदा कर दिया है। चूंकि, व्यक्ति अकेला हो गया है, इसलिए वह मूल्यों से कट गया है और कई बार गलत कदम उठा ले रहा है। यह भी कहा जाता है कि आजकल बच्चों में सामूहिकता की भावना लुप्त होती जा रही है, इसलिए वे स्वार्थी होते जा रहे हैं। ये सारी बातें अपनी जगह सही हैं, लेकिन सामूहिकता के दूसरे पहलुओं पर विचार करना भी जरूरी है।
समाज में व्यक्तिवाद यूं ही नहीं आ गया है। दुनिया में इसके पक्ष में बड़े-बड़े आंदोलन हुए और उसे प्रतिष्ठा मिली। सामूहिकता कई बार मनुष्य को वैचारिक रूप से परतंत्र बना देती है। आदमी समूह का दास बन जाता है और समूह के मूल्यों को ही अंतिम मान लेता है। वह मौलिक चिंतन करने की जरूरत ही नहीं महसूस करता। लेकिन जिन लोगों ने समूह के दबाव को नकारकर अपना रास्ता खुद ढूंढा, वे समाज के लिए ज्यादा उपयोगी साबित हुए। कई समूहों ने ही जातिवाद या इस जैसी दूसरी कुप्रथाओं को पाल-पोसकर रखा, लेकिन इन कुरीतियों को चुनौती देने की शुरुआत समूह से टकराकर ही हुई।
Wednesday, 25 February 2009
सामूहिकता के विरुद्ध
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