अतीत में ऐसी कई मिसालें मिलती हैं कि कैसे बड़े अभियानों से देश और समाज में व्यापक परिवर्तन आए। कुरीतियों का खात्मा हुआ और कई सामाजिक
सुधार हुए। इस आधार पर कहा जाता है कि बड़े अभियान चलाए बिना कुछ हासिल नहीं होता।
आज के नौजवान भी अक्सर यह दुहाई देते हैं कि जिंदगी में कुछ बड़ा किया जाए, तो ही जीवन की सार्थकता है। बड़ी पूंजी लगाई जाए, बड़े कारखाने खोले जाएं। पर क्या बड़े अभियान और बड़ी योजना के बिना जिंदगी में वास्तव में कुछ भी कायदे का नहीं हो सकता? अक्सर होता यह है कि बड़ी योजनाओं का सपना देखते-देखते पूरी उम्र बीत जाती है। जिस तरह कोई बड़ी इमारत छोटी-छोटी ईंटों को लगाए बिना नहीं बन सकती, कोई लंबी रस्सी छोटे-छोटे रेशों को एक साथ बंटने से नहीं पूरी हो सकती, उसी तरह कोई बड़ी योजना छोटे-छोटे प्रयासों के बिना मुकम्मल नहीं हो सकती। छोटी जलधाराएं नहीं होतीं, तो बड़ी नदी भला किस तरह बनती? छोटी-बड़ी हर तरह की नदियां नहीं होतीं, तो क्या महासागरों को भरा जा सकता था? बड़े अभियानों का आरंभ एक छोटी कोशिश है, उसकी सार्थकता यही है कि उसके बिना कोई योजना बड़ी बन ही नहीं सकती।
संजय वर्मा
Tuesday, 24 February 2009
बड़ा अभियान
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