Tuesday, 24 February 2009

जो अपरिभाषित है

यह जरूरी नहीं कि जीवन की हर वस्तु या प्रसंग के दो पहलू हों -रात और दिन की तरह। जीवन का इतना सरल विभाजन कई स्तरों पर तो है, लेकिन हर जगह
इसे ढूंढना गलत होगा। हमने अपनी सुविधा के लिए दो पहलू जरूर बना लिए हैं, पर चीजें उन्हीं में सिमटी नहीं। ऐसा नहीं है कि जीवन में या तो सुख है या फिर दुख, सच है या फिर झूठ।

असल में सुख और दुख के बीच की भी एक अवस्था है। इसी तरह सच और झूठ के बीच भी कोई स्थिति है। इनके बीच एक रेखा है जो स्थान, समय और व्यक्ति की समझ और सोच के मुताबिक धुंधली तथा गहरी होती रहती है। इसी तरह निर्णय और अनिर्णय के बीच की भी एक दशा होती है, जिसमें अधिकतर लोग फंसे रहते हैं। 'बिटविन द लाइंस' की अवधारणा इसी के कारण पैदा हुई है। यानी अर्थ और अनर्थ के बीच तथा कहे और अनकहे के बीच अभी बहुत कुछ है, जिनका सामने आना बाकी है। संभव है, प्रकट और अप्रकट के बीच की किसी अवधारणा में हमें भावी जीवन के कई अहम सूत्र मिल जाएं। हो सकता है अब तक जो अपरिभाषित है, उसी में हमें अपने समय की कोई परिभाषा मिल जाए।

संजय कुंदन   

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