पहले मनुष्य का जीवन बेहद सीमित था। उसके खान-पान के व्यंजन सीमित थे। अपने क्षेत्र में उपलब्ध सामग्री से वह अपना भोजन तैयार करता था। उस के मनोरंजन के साधन सीमित थे -खेल-कूद, गीत, नृत्य, बतरस, युद्ध कौशल और कलाओं का प्रदर्शन आदि। उसके काम की प्रकृति भी युद्ध, व्यापार, शिक्षा और कृषि तक सीमित थी।
धीरे-धीरे सभ्यता का विस्तार हुआ। लोग चांद तक जाने लगे। हवाओं में उड़ने का आनंद लेने लगे। टीवी और कंप्यूटर भी काम और मनोरंजन में शामिल हो गया। देश-विदेश के परिधान, गहने और व्यंजन उपलब्ध होने लगे। आसपास लिफ्ट, कार, प्लेन, पिजा, मसाज, कैसिनो, बार, डियो, आई-पॉड जैसी चीजों की तादाद जितनी बढ़ी, उनको भोगने की आदमी की आजादी उतनी घटती गई। पहले आदमी के पास जो कुछ भी था, उसे वह जी भर कर जी सकता था।
जीवन के हर पक्ष का जी भर कर सुख ले सकता था। अब उसके जीवन में अनगिनत चीजें आ गई हैं, पर उसके भोग का दायरा संकुचित हो गया है। आसपास चीजें बहुत सारी हैं, पर वह चंद चीजों के सहारे ही जीवन बिता रहा होता है। चीजों को भोगने की लालसा में जीवन को जीने का सुख उसके हाथ से फिसल गया है।
बामुसि
Wednesday, 25 February 2009
जिंदगी और सामान
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