कोई नहीं चाहता कि उसके जीवन में दुख-तकलीफ आए। हम दुख को नकारते जरूर हैं पर उसे अपने जीवन से बाहर नहीं कर
ते। प्राय: उसे संजो कर रखते हैं। जब हमारे सामने कोई अपने किसी कष्ट की चर्चा शुरू करता है तो हम भी अपने किसी पुराने दुख पर बात करने लगते हैं।
अगर हम दुख पर चर्चा करते दो लोगों को देखें तो लगेगा कि दोनों में अपने कष्ट को बड़ा बताने की होड़ सी लगी हुई है। हर व्यक्ति अपने कष्ट को सबसे बड़ा मानता है क्योंकि उसकी अनुभूति से वह सीधा जुड़ा होता है। अगर मनुष्य को अपने दुखों से प्यार नहीं होता तो साहित्य में ट्रैजिडी की अवधारणा ही सामने नहीं आती, केवल सुखांत साहित्य रचा जाता।
असल में दुख एक कसौटी है। दुख की चर्चा के पीछे यह भाव रहता है कि देखो मैं इतनी तकलीफों को पार कर यहां तक पहुंचा हूं, मैं इतने कष्टों के बीच भी अविचल रहा हूं। दुख के माध्यम से हम स्वयं को प्रमाणित करते हैं। दुख एक ध्वज है जिसे लहराकर हम अपनी सफलता की घोषणा करते हैं।
संजय कुंदन
Tuesday, 24 February 2009
दुख का महत्व
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