हम कुछ चीजों को अपना व्यक्तिगत मामला बताते हैं लेकिन सच कहा जाए तो हमारे कई निजी प्रसंगों का गहरा सामाजिक संदर्भ होता है। हमारा कोई भी मनोभाव समाज से या सार्वजनिक जीवन से निरपेक्ष नहीं है।
अगर कोई समाज को नकारना चाहता है, तो उसके भीतर उपजे नकार के भाव के लिए भी सामाजिक परिस्थितियां ही किसी न किसी रूप में जिम्मेदार होती हैं। ऐसे लोग बहुत हैं, जिनका निजी कष्ट एक व्यापक सार्वजनिक पीड़ा के रूप में व्यक्त होता है। जैसे कोई व्यक्ति प्रेम में असफल होने के बाद अचानक देश और समाज के लिए चिंता व्यक्त करने लगता है। संभव है प्रेम हासिल होने के बाद उसकी यह चिंता समाप्त हो जाए। लेकिन इसका उलटा भी संभव है। ऐसे भी लोग हैं जो अपनी निजी चिंताओं से ऊपर उठ जाते हैं। वे दूसरों के दुखों को अपना समझते हैं और उन्हें दूर करने के लिए उसी तरह तत्पर हो जाते हैं जिस तरह वे अपने कष्टों से लड़ते हैं। ऐसे लोग कम होते हैं, लेकिन इन्हीं के बीच से समाजसुधारक या राष्ट्रसेवी पैदा होते हैं।

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