समाज में अच्छाई का प्रचार निरंतर चलता रहता है। इसके लिए शिक्षा सबसे बड़ा माध्यम है। मनुष्य को शिक्षित करना दरअसल उसे बेहतर मनुष्य बना ने का प्रयत्न है। नियमित शिक्षण कार्य के अलावा कुछ लोग धार्मिक उपदेशों के जरिए समाज को अच्छाई का संदेश देते रहते हैं। फिर भी समाज से बुराई खत्म होने का नाम नहीं ले रही, जबकि बुराई का तो कोई प्रचार भी नहीं करता। कभी किसी अपराधी ने आज तक जुर्म के पक्ष में भाषण नहीं दिया।
हत्यारों ने बाकायदा संस्था बनाकर हत्या करने के तरीके नहीं सिखाए, बल्कि इसके विपरीत वे लोगों को अपराध से अलग रहने की सलाह देते हैं। इसका अर्थ यह है कि असभ्यता को सीखना नहीं पड़ता, वह तो स्वाभाविक रूप से हमारे भीतर होती है। लेकिन हम प्रयत्न करके सभ्य बनते हैं, यानी अच्छाई हमें सीखनी पड़ती है।
हम शिक्षा और संस्कृति के हथियारों से अपनी स्वाभाविक वृत्ति को परास्त करने का प्रयत्न करते हैं। इसलिए अगर बुराई आज भी दिख रही है तो इसका मतलब यह है कि अच्छाई के प्रचार का काम कहीं न कहीं कमजोर पड़ रहा है।
Wednesday, 25 February 2009
अच्छाई का प्रचार
Labels:
Amarjeet Singh,
hotamar,
NavBharat Times,
Ulatvasi,
अच्छाई,
उलटवांसी,
नवभारत टाइम्स,
बुराई,
शिक्षा,
संजय कुंदन
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

0 comments:
Post a Comment