दुनिया में कुछ गिने-चुने लोग ऐसे भी हैं जिन्हें दर्द महसूस नहीं होता। किसी जेनेटिक खामी से पीड़ा की संवेदना उनके मस्तिष्क तक पहुंच ही नहीं पाती। छुटपन में दांत आने के बाद कुछ खाने की कोशिश में अक्सर वे अपनी जीभ काट लेते हैं। फिर चोटें धीरे-धीरे घातक होने लगती हैं। इंसान ही नहीं, कोई भी जीव अपनी तकलीफों के जरिए ही जानलेवा गलतियों से बचना सीखता है।
लेकिन पीड़ा की संपदा से वंचित ये लोग जीना नहीं सीख पाते और कम उम्र में ही संसार से विदा हो जाते हैं। दर्द अगर जीवन के लिए इतना ही जरूरी है तो फिर उससे इतनी नफरत हम क्यों करते हैं? नफरत तो उन चीजों, उन स्थितियों से की जानी चाहिए, जो हमें तकलीफ पहुंचाती हैं। ज्यादातर मामलों में उनके सामने हम लाचार होते हैं, लिहाजा अपनी सबसे जरूरी संवेदना से ही धीरे-धीरे नफरत करना सीख लेते हैं। दर्द के कारणों का निदान हर हाल में खोजा जाना चाहिए। लेकिन यह रास्ता अगर कभी बंद होता लगे तो दर्द के साथ आत्मिक संवाद बनाना भी हमें जरूर सीखना चाहिए।
चंद्रभूषण
Tuesday, 3 March 2009
दर्द है तो जिंदगी है
Labels:
Amarjeet Singh,
Dard,
Duniya,
hotamar,
NavBharat Times,
Ulatvasi,
Zindagi,
उलटवांसी,
जिंदगी,
तकलीफ,
दर्द,
दुनिया,
नवभारत टाइम्स
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

0 comments:
Post a Comment