दुख और निराशा प्राय: हरेक के जीवन में आते हैं। ऐसे में कई बार हालात से परेशान व्यक्ति को यह कहकर ढांढस बंधाया जाता है कि अंधेरी सुरंग के दूसरे छोर पर आशाओं की रोशनी होती है। यानी दुख का यह दौर बीतते ही सुख दिखाई पड़ेगा। हालांकि बहुत बार ऐसा होता है कि व्यक्ति की स्थितियों में कोई बदलाव नहीं होता।
अगर वह गरीब है, तो ताउम्र गरीब बना रहता है। अगर उसे कोई और कष्ट है, तो वह उस कष्ट से कभी निकल नहीं पाता है। पर उससे आशा भरी बातें कहने और उसे ढांढस बंधाने का असर यह होता है कि वह व्यक्ति धीरे-धीरे अपने कष्टों का अभ्यस्त हो जाता है। वह अपने दुखों से उबरता नहीं है, बल्कि उन दुखों के साथ रहना सीख जाता है।
लोगों को लग सकता है कि पहले जो व्यक्ति कष्टों में घिरे होने के कारण उदास रहा करता था, अब संभवत: दुखों से निजात पा चुका है, इसलिए प्रसन्न और सामान्य रहता है, जबकि असलियत में उसके कष्ट कायम रहते हैं, पर उनका आदी हो जाने की वजह से वह उनसे पहले की तरह पीडि़त नजर नहीं आता।
Wednesday, 4 March 2009
दुख और जीवन
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