मनोवैज्ञानिक इस बात पर काफी सिर खपाते रहे हैं कि जीवन से जुड़ाव या अलगाव की वजह क्या है। आमतौर पर यह माना जाता है कि जिन्हें जीवन में सब कुछ हासिल हो गया वे बेहद संतुष्ट रहते हैं और जीवन से उनका जुड़ाव बहुत ज्यादा होता है। लेकिन इसका उलटा भी होता है। कई बार घोर संतुष्ट व्यक्ति के जीवन में भी एक अलगाव सा आने लगता है, क्योंकि उसके जीवन में प्राप्ति की जगह नहीं रह जाती। उसके भीतर यह अहसास आ जाता है कि अब तो सब कुछ पा लिया, अब बचा क्या? यह तृप्ति भी कई बार जीवन के प्रति उत्साह कम कर देती है। इसलिए प्राप्ति की चाह का होना बेहद जरूरी है। जो लोग भौतिकता का निषेध करते हैं वह भी आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति या सिद्धि की चाह रखते हैं। इसलिए जीवन के प्रति उनमें उत्साह कायम रहता है। कई समृद्ध देशों में आदमी का बढ़ता अकेलापन इसी वजह से है। वहां भौतिकता से मिली तृप्ति के बाद प्राप्ति का कोई दूसरा संदर्भ नहीं पैदा होता। उनके सामने एक ही लक्ष्य होता है और उसके करीब आते ही जीवन के प्रति उत्साह में कमी आ जाती है।
Saturday, 21 March 2009
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