यह विडंबना ही है कि जिस भविष्य को अक्सर आशंकाओं के साथ देखा जाता है, जिसके बारे में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जाता है, उस भविष्य का सभ्यता जोरशोर से स्वागत करती है। बेशक, भविष्य सपने जगाता और उम्मीदें बंधाता है, पर अतीत के बरक्स वह बिल्कुल फुसफुसा होता है। अमूर्त भविष्य का स्वागत हम शायद इस उम्मीद के साथ करते हैं कि जो आशंकाएं उसके साथ जुड़ी हैं, वे मूर्त रूप में परिणत नहीं हों। इसलिए अच्छा हो कि जो बीत गया है, हम उसका शुक्रिया अदा करें। अच्छा या बुरा, जैसा भी वक्त बीता- कम से कम वह हमारे सामने पूरी तरह स्पष्ट होता है।
तीत में जो कुछ बुरा हुआ, हम चाहें तो उससे कोई सबक ले सकते हैं। जो अच्छी बातें हुईं, कामना कर सकते हैं कि वे हमारे जीवन में बार-बार घटित हों। सच तो यह है कि भविष्य के मुकाबले बीता हुआ वक्त ज्यादा सार्थक और स्पष्ट होता है। कम से कम उसमें कोई अनिश्चय तो नहीं होता, कोई उलझन उसमें नहीं बचती। आइए, जरा पलटकर बीते हुए को देखें और इसका शुक्र मनाएं कि तमाम आशंकाओं, चिंताओं, दुविधाओं के बावजूद वह जो छोड़ गया है, उसी पर आप अपने भविष्य के किले बनाएंगे।
संजय वर्मा
Thursday, 5 March 2009
बीते का शुक्रिया
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