Thursday, 5 March 2009

रंगमंच है जीवन

जीवन की तुलना रंगमंच से की गई है। कहा गया है कि जैसे अभिनेता विभिन्न चरित्रों को मंच पर जीते हैं उसी तरह हमें भी अपने जीवन के लिए कुछ भूमिकाएं दी गईं हैं, जिनका हमें निर्वाह करना है। नाटक में नेपथ्य की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नेपथ्य में ही अभिनेता सजते-संवरते हैं और अपने को किसी चरित्र में ढालते हैं।

जीवन में भी नेपथ्य का कम महत्व नहीं है। सच कहा जाए तो मंच से ज्यादा नेपथ्य का ही विस्तार है। हमारा मन दरअसल इसी नेपथ्य का हिस्सा है। इसमें न जाने कितनी चीजें पड़ी हुई हैं। इसमें तरह-तरह की इच्छाएं हैं, प्रयत्न हैं। आदमी जिस रूप में सामने दिखता है, वैसा ही वह नेपथ्य में भी हो, नहीं कहा जा सकता।

नेपथ्य से कौन सी चीज किस मकसद से निकली है, कहना मुश्किल है। हो सकता है व्यक्ति के किसी सदाचरण के पीछे कोई खतरनाक इच्छा छिपी हो। यह भी संभव है कोई व्यक्ति किसी सार्थक उद्देश्य से गलत फैसले कर रहा हो। असलियत तो नेपथ्य ही बता सकता है, जो अंधेरे में होता है और जिसका पता सिर्फ उस व्यक्ति को मालूम होता है।

संजय कुंदन 

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