आपको यह अजीब लग सकता है, लेकिन जिंदगी में सुख की अहमियत का पता हो या न हो, दुख की अहमियत लगभग सभी ने मान ली है। दुख को ऐसी भट्ठी माना गया है, जिससे आत्मा का सोना आकार लेता है। लेकिन सुख? क्या वह सिर्फ दुख का नहीं होना है? या फिर, जैसा कि साइंटिस्ट कहते हैं, एक इनाम है, जो हमें संसार में अच्छा बर्ताव करने के लिए मिलता है? जो भी हो, लेकिन वह जीवन का मकसद नहीं हो सकता, जैसा कि बहुत से लोग मानते हैं। इसलिए कि शाश्वत सुख, ऐसा सुख जिस पर दुखों की छाया कभी पड़ती ही न हो, मुमकिन नहीं है। प्रैक्टिकल ही नहीं, सैद्धांतिक तौर पर भी, क्योंकि तब तो सुख का अहसास ही नहीं रहेगा। जिस सुख ने दुख न जाना हो, वह पैदा हो ही नहीं सकता, इसीलिए जबर्दस्त रूप से सुख भोग रहे लोग भी जिंदगी से आजिज आ जाते हैं। सुख की महिमा जितनी हो, इस विडंबना से नहीं बचा जा सकता।
संजय खाती
Friday, 20 March 2009
सुख और दुख
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