परीक्षा के बारे में यह आम धारणा है कि इसमें हमारी इच्छा या सुविधा से कुछ नहीं होता, जो भी होता है 'पर इच्छा से' होता है। एक दम अप्रत्याशित। हमें दूसरों के विवेक के अनुसार स्वयं को योग्य सिद्ध करना होता है। यही वजह है कि इसे लेकर हमारे मन में एक भय घर कर लेता है। जब भी हम किसी परीक्षा के लिए जाते हैं, हमारे सामने उसके अनुसार खुद को ढालने की चुनौती रहती है। पर तैयारी के उन्हीं क्षणों में परीक्षा महज 'पर इच्छा नहीं' रह जाती।
दरअसल, वहीं से हम अपने युक्ति, तर्क और कौशल से उस 'पर इच्छा' पर काबू पाने की शुरुआत करते हैं, जो कभी कल्पनाओं में भी हमें डराया करती थी। कौन कितनी जल्दी इस पर काबू पाता है या अपना प्रयास छोड़ बैठता है, यह तो निश्चय ही हमारे स्वभाव पर निर्भर करता है। पर आगे परीक्षक का नहीं हमारा मैदान होता है। परीक्षक हमारे लिए जो ताना-बाना बुनता है, वह उससे आगे नहीं जा सकता। हमारी योग्यता नापने के लिए बनाया गया वही पैमाना परीक्षक की सीमा बन जाती है। लेकिन हम आगे निकल सकते हैं -अपनी तैयारी से, अपने प्रदर्शन के दौरान। आगे बढ़ने का आखिरी अवसर परीक्षार्थी के पास ही होता है।
अनुराग वत्स
Friday, 6 March 2009
परीक्षा को नहीं बनने दें पर इच्छा
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