हम सच का आदर करते हुए भी कई बार उसका पालन नहीं करते, उसमें थोड़ी छूट लेते हैं। यह जरूरी नहीं कि इसके पीछे हमारा कोई गलत मकसद हो। हम अकसर अपने किसी आत्मीय को राहत पहुंचाने के लिए ऐसा करते हैं। हम सोचते हैं अगर नियम-कायदों में थोड़ी ढील दे देने से किसी का भला हो जाए तो क्या हर्ज है।
हालांकि दुनिया में ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने नियमों के पालन करने में किसी तरह का समझौता नहीं किया और अकेले पड़ जाने का जोखिम उठाया। यह एक आदर्श स्थिति है, लेकिन ऐसा करने वाले लोग कम होते हैं। आम तौर पर लोग सिद्धांत से ज्यादा मानवीय संबंध को महत्व देते हैं। अगर संबंधों के रास्ते में सिद्धांत आते हैं तो वे उसे भी छोड़ देते हैं।
दरअसल संबंध बनाना मनुष्य होने की शर्त है। इंसान रिश्तों के ताने-बाने में जीना चाहता है। वह ज्यादा से ज्यादा लोगों का प्यार अर्जित करना चाहता है। यही वजह है कि कोई भी व्यवस्था अपनी मूल अवधारणा के करीब तो होती है पर हूबहू वैसी नहीं होती। नियम-कायदे सापेक्षिक रूप से ही सफल होते हैं। मनुष्य को बांधा तो जा सकता है पर उसकी भी एक हद है।
संजय कुंदन
Thursday, 5 March 2009
नियम बनाम रिश्ते का बंधन
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