हर व्यक्ति के भीतर विकास की प्रक्रिया चलती है। कई बार सायास तरीके से कई बार अनायास रूप में। हर आदमी अपने को बदलने की कोशिश में जुटा रहता है। इस क्रम में वह अपने ही भीतर की कई चीजों को छोड़कर आगे निकल जाना चाहता है। लेकिन चीजें छूटकर भी खत्म नहीं होतीं। वह हमारे अंदर अलग-अलग रूपों में जीवित रहती हैं। वह बार-बार वापस आती रहती हैं। शहर में बसने वाला व्यक्ति गांव लौटना नहीं चाहता। वह पूरी कोशिश करके ग्रामीण बोलचाल और रहन-सहन से पीछा छुड़ाता है। वह अपने को काटता-छांटता रहता है, ताकि वे चीजें उसके व्यक्तित्व में न झलकें। लेकिन शहर में लगने वाले विशेष मेलों में गांव की बनी दस्तकारी की चीजें वह शौक से खरीद कर लाता है और उसे ड्रॉइंग रूम में सजाता है। वह खुद भले भदेस भाषा का प्रयोग न करे, लेकिन जब फिल्म या विज्ञापन में कोई पात्र ऐसी भाषा बोलता है तो उसे अच्छा लगता है, वह उसका मजा लेता है। यानी उन चीजों के प्रदर्शनकारी स्वरूप को वह स्वीकार करता है। इसी कारण रहन-सहन में बदलाव के बावजूद हमारी जातीय स्मृतियां सुरक्षित रहती हैं।
Tuesday, 24 March 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

0 comments:
Post a Comment