प्लेटो ने कहा था कि यह विश्व यथार्थ नहीं है। वास्तविक जगत कहीं और है। हम जो देखते हैं, वह उस यथार्थ जगत की छाया है। कुछ लोगों को बैठे-बैठे अचानक संगीत या पायल या चूडि़यों की झंकार या किसी परिचित की आवाज सुनाई देती है। हालांकि वह संगीत आसपास कहीं नहीं बज रहा होता है, न कैसेट, न ग्रामोफोन, न डिस्क। वह व्यक्ति भी आसपास कहीं मौजूद नहीं होता। वह आवाज भी उस व्यक्ति विशेष के अलावा और किसी को सुनाई नहीं देती। क्या वह आवाज या संगीत व्यक्ति विशेष सिर्फ अपने मस्तिष्क में सुनता है? क्या वह उस वास्तविक जगत की किन्हीं ऐसी ध्वनियों को महसूस करता है, जिसे सुनने की क्षमता दूसरों के भीतर नहीं होती? विज्ञानी कहते हैं कि ध्वनि की ऊर्जा तरंगें होती हैं और वे धूमिल पड़ती हैं, पर तरंगें कभी समाप्त नहीं होतीं। क्या वे फिर से कभी घनीभूत होकर हमारे कानों से टकरा सकती हैं? किसी अंधेरी रात में कुत्ते सामूहिक रूप से अचानक क्यों रोते हैं, जबकि हमें कोई प्रत्यक्ष कारण नजर नहीं आता। क्या वे ऐसी ही किन्हीं ध्वनि तरंगों को महसूस करते हैं। वेदांत में जिस माया की बात की गई है, क्या यह उसी का आभासी है? किसी गंभीर गणित पर सोचते-सोचते सो जाते हैं और सुबह या सपने में हमें उसका हल मिल जाता है। क्या यह सब हेलुसिनेशन है? या उस वास्तविक जगत के प्रति हमारी चेतना का सक्रियता क्यों नहीं, जो दूसरों में विकसित नहीं हुई हो।
Tuesday, 24 March 2009
माया और यथार्थ
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