सत्य को सबसे बड़े मानवीय गुणों में गिना जाता है। पर सच को कटु या कड़वा भी कहा जाता है। अक्सर कहा जाता है कि सच्ची बात तो चुभेगी ही। आखिर सच का यह कैसा गुण है कि वह दिल पर बरछी सा प्रहार करे? क्या शायद इसीलिए कहीं-कहीं यह ताकीद की गई है कि ऐसा सच बोलिए, जो प्रिय हो?
संभवत: अच्छे गुणों के साथ इन उपमाओं को जोड़ने का उद्देश्य सद्गुणों की महत्ता स्थापित करना होगा। असल में सद्गुणों का एक दुर्गुण यह है कि वह अपने साथ कोई न कोई अहंकार लाता है। सच के साथ कटुता का मेल इसी का नमूना है। सौंदर्य यानी रूप में भी दंभ रूपी अहंकार झलकता है। सुभाषित कहने वालों ने इस महीन गठजोड़ को पकड़ा है। इसीलिए उन्होंने सच की प्रियता की जरूरत की ओर इशारा किया है। सौंदर्य के साथ विनयशीलता जरूरी मानी है। चूंकि सच को मृदुता के साथ कहने वालों की बेहद कमी है और सच बोलने वाले ज्यादातर लोग अहं के शिकार हो जाते रहे हैं, इसलिए सच के साथ कटुता का मेल स्थापित हो गया और कड़वे सच की बात चलन में आ गई।
संजय वर्मा
Friday, 27 March 2009
अवगुण का दुर्गुण
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