हर व्यक्ति दूसरे पर प्रभाव जमाना चाहता है। वह चाहता है कि उसे लोगों की सराहना मिले। हर कोई लोकप्रिय होना चाहता है। यह इच्छा ही लोगों के व्यवहार को नियंत्रित करती है। बहुत से लोग लोकप्रिय होने या प्रशंसा बटोरने के लिए भी सदाचरण करते हैं। वे भलाई करते हैं, मीठी बोली बोलते हैं, हमेशा हंसते रहते हैं। लेकिन प्रशंसा हासिल करने के चक्कर में वे कई बार समझौते करते हैं और अपने मन के विपरीत काम करते रहते हैं।
जो लोग दूसरों को नाराज करने का साहस नहीं रखते, वे जीवन में कोई जोखिम भी नहीं ले पाते। उन्हें विरोध से डर लगने लगता है। वे ऐसा कोई कदम उठाना ही नहीं चाहते, जिस पर किसी को आपत्ति हो। इसलिए ऐसे लोग लोकप्रिय होने के बावजूद एक सीमित दायरे में कैद हो कर रह जाते हैं। समाज में वे पसंद जरूर किए जाते हैं, लेकिन वे समाज के लिए उपयोगी नहीं रह जाते। समाज के लिए उपयोगी तो वे होते हैं जो विरोध की परवाह नहीं करते और अलोकप्रिय तथा अलग-थलग पड़ जाने का खतरा उठाकर भी बड़े फैसले करते हैं और अपना रास्ता खुद बनाते हैं।
संजय कुंदन
Friday, 6 March 2009
विरोध का डर
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