किसी त्योहार के आने के कुछ समय पहले तक लोग प्राय: यह कहते पाए जाते हैं कि अब त्योहार मनाने का अर्थ ही क्या रह गया है, जीवन इतना कष्टप्रद और असुरक्षित हो गया है कि सारे पर्व बेमानी हो गए हैं। कोई महंगाई को कोसता है तो कोई हाल के किसी हादसे का हवाला देकर पर्व से दूर रहने की बात करता है। लेकिन ज्यों-ज्यों त्योहार नजदीक आने लगता है, ये सारे तर्क कमजोर पड़ने लग जाते हैं और आखिरकार ध्वस्त हो जाते हैं।
हर व्यक्ति पर्व में किसी न किसी रूप में शामिल हो ही जाता है। असल में हम दुख-तकलीफ को स्वीकार तो करते हैं, पर उससे मुक्ति के रास्ते भी ढूंढते रहते हैं। काफी मुश्किलों से घिरा आदमी भी हंसने के बहाने खोज ही लेता है। मनुष्य मूलत: उत्सवधर्मी है। अगर वह कष्टों और विघ्न-बाधाओं को ही अंतिम सत्य मानकर बैठ गया होता, तो शायद सभ्यता आगे न बढ़ती। मनुष्य ने अपनी तमाम कठिनाइयों के बीच भी उत्सव मनाए। सारे त्योहार दरअसल दुख के खिलाफ प्रतिरोध हैं। हम त्योहार मनाकर विसंगतियों को चुनौती देते हैं और उन्हें हराने की तैयारी करते हैं।
संजय कुंदन
Monday, 16 March 2009
त्योहारों का सच
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