Saturday, 21 March 2009

अपना बनाम दूसरों का नजरिया

यह एक सामान्य बात है कि हर आदमी का अपना-अपना नजरिया होता है। हर व्यक्ति अपनी नजर से सब कुछ को देखता है और अपनी जिंदगी जीता है। लेकिन अगर हमारे सामाजिक जीवन की पड़ताल की जाए तो पता चलेगा कि मनुष्य अपने जीवन में अपने नजरिए का कभी इस्तेमाल ही नहीं करता या यह भी कहा जा सकता है कि इसका उसे मौका नहीं मिलता। युवा जीवन से ही दूसरों के नजरिए से चलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। करियर चुनते वक्त इस बात का ध्यान रखा जाता है कि अमुक क्या कर रहा है। उसे देखकर ही उस जैसा या उससे बेहतर बनने की कवायद शुरू हो जाती है। इसी तरह पहनावे-ओढ़ावे में भी लोग इस बात का ध्यान रखते हैं कि आजकल चलन क्या है या सामने वाले ने क्या पहन रखा है। जीवन के हर छोटे-बड़े निर्णय को इसी तरह दूसरे प्रभावित करते हैं। अगर कोई यह हिसाब लगाने लगे कि उसने कितने फैसले अपनी मर्जी से लिए तो शायद उसे निराशा ही हाथ लगेगी। कभी मित्र, कभी पड़ोसी तो कभी भीड़ तो कभी समाज हमारे जीवन को तय करता है। लेकिन इसी में जो लोग अपने नजरिए से काम लेने का साहस दिखाते हैं, वे मनुष्यता को एक नई दिशा दे जाते हैं।

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