हम में से ज्यादातर लोग यह दावा करते हैं कि वे अच्छे को अच्छा तथा बुरे को बुरा कहने में कभी नहीं झिझकते। वे कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति में कोई सद्गुण है, तो वे खुल कर उसकी प्रशंसा करते हैं। और यदि कोई अवगुण है, तो बेखौफ उसके दोष बताते हैं। पर इस दावे में ज्यादा सचाई नहीं होती।
असलियत में गुण-दोष का हमारा विवेचन हमारे अपने राग-द्वेष से संचालित होता है। इस मामले में हम अक्सर छल ही करते हैं, क्योंकि यदि किसी व्यक्ति या वस्तु से हमारा अच्छा संबंध है, तो उसकी जरा सी अच्छाई भी हमें महान लगती है। यहां तक कि उसके दुर्गुणों को भी हम अच्छे रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं।
पर अपने पड़ोसी या उस व्यक्ति से जुड़ी कोई भी चीज भली मालूम नहीं पड़ती, जिससे हम किसी भी कारणवश खार खाते हों। उस व्यक्ति में लाख अच्छाइयां हों, पर वे हमें दिखाई नहीं देतीं। इसके उलट उन्हें हम उस व्यक्ति की कमजोरियों के तौर पर इंगित करते हैं। इसलिए कौन अच्छा है और कौन बुरा, यह हमारे न्याय-विवेक से नहीं, बल्कि स्वार्थों से निर्धारित होता है।
संजय वर्मा
Thursday, 5 March 2009
अच्छे को अच्छा कहना
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