Friday, 20 March 2009

सीखे को भूलें

प्राय: सभी धार्मिक उपदेशक और सदाचार से जुड़े ग्रंथ मनुष्य को नकारात्मक प्रवृत्तियों से बचने की सलाह देते हैं। पर कहीं यह ठीक-ठीक नहीं बताया जाता कि आखिर लालच और झूठ जैसी बुरी आदतें और भय के समान नकारात्मक वृत्तियां इंसान में कहां से आती हैं। क्या वे जन्मजात पैदा होती हैं? या उन्हें वक्त के साथ-साथ हम अपने आसपास के माहौल से सीखते हैं? इसका कोई सटीक उत्तर भले ही नहीं दिया जा सके, पर ज्यादा संभावना इसी बात की बनती है कि हम ऐसा नकारात्मक व्यवहार अपने परिवार और समाज से ही सीखते हैं। और आगे चलकर इनका असर कई बार इतना ज्यादा होता है कि हम इनके बंदी जैसे हो जाते हैं। यह आश्चर्य ही है कि सीखी हुई ये वृत्तियां मनुष्य पर हावी हो जाती हैं। जो उपदेशक हमें इन नकारात्मक वृत्तियों से बचने की सलाह देते हैं, अगर वे ज्यादा जोर इस बात पर दें कि कैसे इन्हें सीखने से बचा जाए,तो शायद सदाचार ज्यादा प्रभावी हो सके। या कोई ऐसा तरीका वे विकसित कर सकें, जिससे कि सीखने की प्रक्रिया में अच्छा आचरण बुरी आदतों पर प्राथमिकता पा सके, तो शायद भय और लालच अपनी ही मौत मर सकेंगे। सीखे हुए ऐसे व्यवहारों को भुला सकने वाली ऐसी शिक्षा या उपदेश ज्यादा सार्थक हो सके हैं।

संजय वर्मा

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