Wednesday, 18 March 2009

दो कदम पीछे

अक्सर पीछे लौटना मुश्किल होता है। अपनी जमी-जमाई पॉजिशन छोड़कर कदम पीछे खींचना अपमानजनक महसूस होता है। पर पीछे लौटना एक स्ट्रैटिजी है। आगे बढ़ने के ख्वाहिशमंद हैं, तो कदमों को लौटाने का हुनर सीखिए। दुश्मन से जंग में पीछे लौटना कई बार बेहद बुद्धिमानी का काम होता है। हम पीछे लौट रहे हैं, यानी दुश्मन को ऐसी खाई की तरफ न्योत रहे हैं, जहां का चप्पा-चप्पा हमारा जाना-पहचाना है। हम पीछे लौट रहे हैं, यानी आगे बढ़ने के लिए एक ठोस जमीन तैयार कर रहे हैं। जब आगे बढ़ना बेहद मुश्किल हो रहा हो, तो पीछे लौट कर ही हम पाते हैं कि आगे बढ़ने के लिए अब किस और योग्यता व ताकत की जरूरत है। पीछे लौटने पर ही हमें यह अहसास हो पाता है कि आगे बढ़ने की हमारी कोशिश में कितनी खामियां थीं। अगर ललक आगे बढ़ने की हो, तो पीछे लौटने पर हम में आगे बढ़ने का नया जोश पैदा हो सकता है। लेकिन यह पीछे लौटना किसी गर्त में गिर पड़ना नहीं है। इस तरह पीछे लौटकर तो खुद को नए संकल्प के लिए तैयार करना है। इसलिए पीछे लौटें, तो इस तरह लौटें कि आगे बढ़ने की हर बाधा खत्म हो जाए। आगे बढ़ने की हर अड़चन मामूली बन जाए।

संजय वर्मा

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