कहा जाता है कि आज का इंसान बेहद डरा हुआ है। जीवन के हर मोड़ पर भय का कोई न कोई संदर्भ जरूर मौजूद है। हर व्यक्ति अपने को असुरक्षित महसूस कर रहा है। लेकिन सुरक्षा का भी कोई अंतिम मानक नहीं है। कोई यकीन के साथ नहीं कह सकता कि उसे कितनी सुरक्षा चाहिए।
हो सकता है कोई व्यक्ति अपनी जान की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह निश्चिंत हो, लेकिन यह भी मुमकिन है कि वह भावनात्मक रूप से खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा हो। कई लोग अकेलेपन से डरते हैं। मतलब यह कि जीवन में भय की उपस्थिति बेहद अहम और निर्णायक है। कई बार असुरक्षा का भाव हमसे कई तरह के काम करवा ले जाता है।
व्यक्ति जो कुछ भी अर्जित करता है, दरअसल उसके पीछे स्वयं को सुरक्षित बनाने का भाव होता है। सुरक्षा की तलाश में ही व्यक्ति विद्या हासिल करता है धन हासिल करता है, समाज में अधिक से अधिक लोगों से संपर्क कायम करने की कोशिश करता है। अगर भय या असुरक्षा न रहे तो संभव है व्यक्ति शिथिल पड़ जाए या उसके प्रयासों में गहराई न रह जाए।
संजय कुंदन
Friday, 6 March 2009
भय की भूमिका
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