हम प्राय: नई चीजों को संदेह की नजरों से देखते हैं। नएपन को लेकर हमारे भीतर एक तरह का अविश्वास होता है। यहां तक कि नई पीढ़ी के आचार-विचार हमें अटपटे लगते हैं। नौजवानों के साथ कभी अकेले समय गुजारना पड़े तो उनका व्यवहार संकोच में डाल देता है। हम अंदर-अंदर ही शरमाते हैं। हम उनसे एक दूरी बना लेते हैं। भले ही हमारा उनसे भावनात्मक लगाव हो, लेकिन उनके रहन-सहन के तौर-तरीके और सोच पर हम गहरी आपत्ति करते हैं। गौर करें तो नई पीढ़ी में यह जो कुछ आया है वह उन्होंने अपनी पुरानी पीढ़ी से ही ग्रहण किया है। उनकी जो चीजें हमें अस्वाभाविक लगती हैं, उनके बीज कहीं न कहीं हमारे ही भीतर मौजूद रहे हैं। मुश्किल यह है कि हम उन्हें दोषी तो ठहराते हैं, लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करते कि ये सब उनके भीतर आया कहां से। हम भूल जाते हैं कि वर्तमान की जड़ें अतीत में ही हैं। इसलिए अगर हम नई पीढ़ी को समझना चाहते हैं तो हमें अपने भीतर भी झांकना चाहिए। खुद को पहचाने बगैर हम नई पीढ़ी को नहीं समझ पाएंगे।
संजय कुंदन
Thursday, 19 March 2009
नए का डर
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