Thursday, 5 March 2009

समय और हम

समय के बारे में हम कल्पना करते हैं कि वह किसी नदी की तरह है। जैसे नदी में जल की धारा प्रवाहित होती है, समय या काल भी प्रवाहित होता है। आज इस क्षण किसी घाट पर नदी का जो जल बहता हुआ पहुंचा है, वह कल या अगले ही क्षण यहां इस घाट पर मौजूद नहीं होगा। वह आगे निकल जाएगा- अगले घाट की ओर। इसीलिए लोकभाषा में कहते हैं कि समय बीत गया, समय गुजर गया।

लेकिन जैसी हम कल्पना करते हैं, क्या सचमुच समय उस तरह से गुजर जाता है? क्या पता समय नहीं बीतता हो, हम ही बीत जाते हों। क्या पता काल सदा स्थिर रहता हो। क्योंकि हमारे बीत जाने का प्रमाण तो है। हमारी कोशिकाएं जवान होती हैं, बूढ़ी होती हैं और फिर मर जाती हैं। हमारा शरीर जर्जर हो जाता है। लेकिन काल स्थिर है या चलायमान, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। हम जिसे समय का परिवर्तन कहते हैं, वह तो असल में हमारे भीतर हो रहा परिवर्तन ही है।

बामुसि 

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