अजीब रिवाज है! जो सक्षम है, बलशाली है- उसकी रक्षा के लिए त्योहार मनाया जाता है। जो शारीरिक रूप से कमजोर और स्वभाव से अहिंसक है- वह अरक्षित है। जो अपनी रक्षा भी कर सकता है और दूसरों का दमन भी करता है, उसकी रक्षा के लिए अभिमंत्रित सूत्र बाँधा जाता है। जो अपनी रक्षा नहीं कर पाती और दमन तथा शोषण दोनों का शिकार बनती है- उसकी हत्या की जाती है- भ्रूण में, निर्जन वन में और सभ्य जनों की चौपाल पर। अजीब रिवाज है कि जब वह हमें राखी का सूत बाँधती है और आशीष देती है तो देवी स्वरूप मानी जाती है और जब हमारे लिए ऐसा नहीं करती तो वह छलना और नरक का द्वार कही जाती है। अजीब रिवाज है कि उसके लिए रक्षा के सूत्र अभिमंत्रित नहीं किए जाते और उसकी रक्षा की कामना के लिए त्योहार नहीं मनाए जाते। तो क्या उससे स्नेह और शुभकामनाओं वाली राखी बँधवाते समय उसे रक्षा का वचन और आश्वासन दे कर हम फिर कोई नया प्रपंच रचते हैं?
Friday, 27 March 2009
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1 comments:
अपने रीति-रिवाजों को केवल प्रपंचों तक सीमित कर लेना ... यह ग़लती तो हमारी है न!
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