Wednesday, 18 March 2009

सत्ता और आनंद

सत्ता और आनंद में हमेशा पारस्परिक बैर रहा है। आनंद सत्ता को नहीं देखता, उसे लांघ जाता है। उसकी सीमाएं राष्ट्र की सत्ता से कहीं आगे ब्रह्मांड की सत्ता तक फैली हैं। सत्ता आनंद की दुश्मन है, क्योंकि आनंद हमेशा से उसके अस्तित्व पर हमला करता आया है। सत्ता को मालूम है कि उसे बचाने वाले अंतत: दुखी, परेशान, गरीब लोग ही हैं, जिन्हें वह भविष्य के स्वप्न दिखाकर अपने वश में किए रख सकती है। इसलिए दुनिया में जहां जहां सत्ताएं हैं, सरकारें हैं, वहां दुखियारों, पीडि़तों, गरीबों का होना तय है। सारी प्रजा अगर धनवान हो गई, सारी प्रजा अगर आनंद में रहने लगी, तो कौन सेना में भतीर् होगा, कौन देश के लिए युद्ध लड़ेगा। अमेरिका धनवान होते हुए भी अपने यहां इतनी गरीबी बचाए हुए है कि उसकी सेनाएं भरीपूरी बनी रहें। जिसके भीतर आनंद उतर जाए वह बहादुरी के पुरस्कारों और मैडलों के प्रलोभन में इराक, वियतनाम या अफगानिस्तान क्यों जाएगा?

सुंदर चंद ठाकुर

0 comments: